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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan'
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Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-96
"उम्रे-नौ की यही कहानी है. जोर है,जोश है, जवानी है. सो रहा है जमीं पे बेचारा. हाँ! ये दिल्ली है,राजधानी है. छीन लेना हकूक औरों के. जन्म-घुट्टी यही पिलानी है. लूट आरक्षणों की क्या-क्या कहूँ. जुल्मतों की बड़ी कहानी है. मैं भी छू लूँ फलक के तारों…"
Jun 27
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.
"ग़ज़ल अच्छी कही है आदरणीय.."
Jun 9
Mohammed Arif commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.
"आदरणीय गंगधर जी आदाब,                         बेहतरीन प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें तथा गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।"
Jun 8
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.
"आ. भाई गंगाधर जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Jun 8
Mahendra Kumar commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.
"बहुत खूब ग़ज़ल हुई है आदरणीय गंगा धर  शर्मा जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.  1. आपने मंच के नियमानुसार अरकान नहीं लिखे हैं.  2. //शाहाना आज देखो उनके मिज़ाज है.// क्या इस पंक्ति में "उनके" की जगह "उनका" होना…"
Jun 8
TEJ VEER SINGH commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.
"हार्दिक बधाई आदरणीय गंगाधर जी।बेहतरीन गज़ल। माज़ी के जो गुलाम हुक्काम हो गए. शाहाना आज देखो उनके मिज़ाज है."
Jun 8
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' posted a blog post

ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.

है अँधेर नगरी चौपट का राज है.हंसों को काला पानी, कौवों को ताज है. आईन का मसौदा ऐसा बुना बुजन नें.घोड़ों की दुर्गति खच्चर पे नाज है. माज़ी के जो गुलाम हुक्काम हो गए.शाहाना आज देखो उनके मिज़ाज है. अंगुश्त-कशी का मुजरिम वो बादशाहे इश्क.मुमताज जिसकी जिन्दा जमुना का ताज है. ‘हिन्दुस्तान’ कहता हरदम खरी-खरी.लफ्जे-दलालती बस ग़ज़ल का रिवाज है.मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jun 8
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post नदिया  पोखर सब सूखे - गजल ( लक्ष्मण धामी " मुसाफिर"
"आदरणीय मुसाफिर साहब....उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई......"
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on रोहिताश्व मिश्रा's blog post ग़ज़ल : बहुत दिनों था मुन्तज़िर
"मेरी शिकस्त की ख़बर नफ़स नफ़स में रच गई,था जिसमें ज़िक्र फ़तह का वो इश्तेहार जल गया।...............वाह.....आदरणीय भाई मिश्रा जी ....बहुत ही कामयाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई..........."
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on Mahendra Kumar's blog post एलियंस /लघुकथा
"गज़ब...भाई महेंद्र कुमार जी बहुत हे सशक्त एवं समीचीन लघुकथा...हार्दिक बधाई..."
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post एक गजल- अगर रात है रात कहूँगा
"आदरणीय बसंत कुमार जी बड़ी ही भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई............"
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल _मेरे हबीब सिर्फ तू क़ुरबत की बात कर
"वाह.....आदरणीय तस्दीक साहब....बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक मुबारकबाद...."
Jun 7
Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"तज्रिबा मुझको है सापों का बहुत ।डस गये जो नाग सब झुककर मिले ।।..........वाह....आदरणीय त्रिपाठी जी .....बहुत ही उम्दा ग़ज़ल  लिए हार्दिक बधाई............"
Jun 7
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।"
May 21
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय | "
May 20

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on Ganga Dhar Sharma 'Hindustan''s blog post ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)
"अच्छी ग़ज़ल कही है आदरनीय बहुत बहुत शुक्रिया तस्दीक साहब की इस्स्लाह से  मैं भी सहमत हूँ "
May 19

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur
Native Place
...
Profession
Poet
About me
A Poet.

सावण सूखो क्यूँ !

सावण सूखो क्यूँ !

इबकाळ रामजी न जाण के सूझी, क बरसण क दिनां मं च्यारूँ कान्या तावड़ की  बळबळती सिगड़ी सिलागायाँ बठ्यो है | जठे देखो बठे ई लोग-लुगावड़ियां में कि बाट देखता-देखता आकता होगा | खेतां मायलो बीज निपजणों भूलगो | तपत  तावड़ के मायनं टाबरां का पसीन स चिड़पड़ा होयोड़ा मूंडां न देखतां निगावां होठां प आयोड़ी सूखी फेफड़ी पर जाक थम ज्याव | पण कर तो के कर , सारो कुण् लगाव | सगळा एक-दूसर न  देख ले और फेरूँ आसमान कानी देखण लागज्या हैं |
एक कानी जांटी कि छाया म बठ्यो गण्डकङो जीब बारणै काड राखी है | गर्मी क मार ऊंकी  ल्हक-ल्हक डट ई कोन्या | 
रामजी सैँकी पत् राखण हाळो है, बं ई न याद करो., सगळा मिल रामजी न याद करण लागज्या है....
रामजी , गेर दे छाँट र |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र | 

तीतरपंखी बादळ आव |
बिन बरसे  पाछा जाव |
पीण न  पाणी कोनी |
तुरत तरस दिखलाव |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |

ळियाँ काची कई  तोड़ली |
 मँहगाई है घणी खोड़ली |
पण राम-रुखाळा सबका |
तू निठुराई  कयां ओढ़ली |
ल्हुका-छिपि क्यांले कर्र्यो , क्यांकि आंट र |
रामजी , गेर दे छाँट र |
देखतां -देखतां छांट पड़ण लागज्या है, बो रामजी घणों दयालु है. 
(गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान')
मौलिक व अप्रकाशित

 

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ग़ज़ल : है अँधेर नगरी चौपट का राज है.

है अँधेर नगरी चौपट का राज है.

हंसों को काला पानी, कौवों को ताज है.

 

आईन का मसौदा ऐसा बुना बुजन नें.

घोड़ों की दुर्गति खच्चर पे नाज है.

 

माज़ी के जो गुलाम हुक्काम हो गए.

शाहाना आज देखो उनके मिज़ाज है.

 

अंगुश्त-कशी का मुजरिम वो बादशाहे इश्क.

मुमताज जिसकी जिन्दा जमुना का ताज है.

 

‘हिन्दुस्तान’ कहता हरदम खरी-खरी.

लफ्जे-दलालती बस ग़ज़ल का रिवाज है.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on June 7, 2018 at 3:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल : नौकरी है कहाँ बता भाई. (२१२२ १२१२ २२)

लाज माँ बाप की बचा भाई.
हो सके तो कमा के खा भाई.

सौ में नम्बर मैं सौ भी ले लूँगा.
नौकरी है कहाँ बता भाई.

खून का रंग एक है लेकिन.
राज जातों में बाँटता भाई.

नूर भी आफ़ताब से लेता.
चाँद में रोशनी कहाँ भाई.

आज 'हिन्दोस्तान' को देखो.
दीखता है खफा खफा भाई.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on May 18, 2018 at 4:27pm — 4 Comments

ग़ज़ल : लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.

लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.

मुठ्ठी में होगी आपके बहार देखिये.

 

चम्मचों से मात वो चक्की भी खा गई.

आटा भी पाता  रहा संसार देखिये.

 

अच्छे को अच्छा दिखता, दिखता बुरा बुरे को.

आईने सा है मेरा किरदार देखिये.

 

आज़ादी की कीमत आज़ाद ने चुकाई.

लाखों हैं आज इसके हक़दार देखिये.

 

पीतल भी आज देखो स्वर्ण हो गया.

खोटा-खरा बताती झनकार देखिये.

 

आसूदगी को मेरी कुछ और न समझ.

गर्के-उल्फत है…

Continue

Posted on March 5, 2018 at 5:35pm — 3 Comments

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए

....................ऑंखें...........................

आँखों में आप काज़ल जरा कम लगाइए.

तारीकियों को इनकी न इतना बढाइए.

हिन्दोस्तां की दुनिया रोशन इन्हीं से है.

अँधेरों से आज इसको वल्लाह बचाइए.

गंगा धर शर्मा 'हिन्दुस्तान'

अजमेर (राज.)

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on February 26, 2018 at 5:46pm — 2 Comments

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At 7:51pm on March 15, 2017, Sushil Sarna said…

aadrneey Gangadyar jee aapke saath mitarta, mera soubhagya hai.thanks

At 11:25am on October 24, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

जनाब गंगा धर साहब आदाब, होसला अफज़ाइ का शुक्रिया

At 9:44pm on October 22, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

good night gangadhar bhai .....aap ka bahut bahut shukriya

At 5:58am on November 1, 2014,
सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी
said…

आदरणीय गंगा धर भाई जी , मेरी रचनायें आपको अच्छी लगीं जान कर बडी खुशी हुई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया । व्यस्तताओं के कारण देर से जवाब दे पाया , क्षमा चाहता हूँ ।

 
 
 

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