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ग़ज़ल (प्यार का हर दस्तूर निभाना पड़ता है)

ग़ज़ल (प्यार का हर दस्तूर निभाना पड़ता है)
(फ्अल_फ ऊलन _फ्अल _फ ऊलन _फ़ेलुन _फा)

प्यार का हर दस्तूर निभाना पड़ता है l
यार का हर ग़म हँस के उठाना पड़ता है l

बाज़ कहाँ वो यूँ आता है महफ़िल में
शीशा नुक्ता चीं को दिखाना पड़ता है l

यूँ ही मुसाफ़िर मिटती नहीं है तारीकी
रस्ते में इक दीप जलाना पड़ता है l

उलफत की मंज़िल आसान नहीं इतनी
धोका हर इक मोड़ पे खाना पड़ता है l

रह पाता है कोई सदा कब दुनिया में
एक न इक दिन सब को जाना पड़ता है l

मज़दूरी मज़दूर को कब यूँ है मिलती
खून पसीना उसको बहाना पड़ता है l

खेल मुहब्बत का तस्दीक है कुछ ऎसा
जिस में दिल दाँव पे लगाना पड़ता है l

(मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Balram Dhakar on December 24, 2018 at 11:44pm

आदरणीय तस्दीक साहब, बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल।

हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

सादर।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 13, 2018 at 5:54pm

जनाब फूल साहिब , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by PHOOL SINGH on December 13, 2018 at 4:52pm

बहुत सुंदर रचना ,बधाई स्वीकारे

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2018 at 4:51pm

मुहतरम जनाब तेज वीर साहिब  , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2018 at 4:50pm

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब, ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I आपने सही फरमाया  इस में की जगह जिस में हो गया l

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2018 at 4:47pm

जनाब भाई लक्ष्मण धामी साहिब  , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 1:31pm

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on December 12, 2018 at 11:01am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।


'जिस में दिल दाँव पे लगाना पड़ता है'

ये मिसरा शायद टंकण त्रुटि का शिकार है? 

Comment by TEJ VEER SINGH on December 12, 2018 at 10:57am

हार्दिक बधाई आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब जी।बेहतरीन गज़ल ।

रह पाता है कोई सदा कब दुनिया में
एक न इक दिन सब को जाना पड़ता है l

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