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इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

22 22 22 22 22 2

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।
और  लगता  है , शुहरत  लेकर  आया हूँ।

बदहाली   में   भी   सालिम   ईमान  रहा,
मैं  दोज़ख़  से   जन्नत   लेकर   आया  हूँ।

मिट्टी,  पानी,   कूज़ागर   की   फ़नकारी,
और  इक  धुंधली  सूरत  लेकर  आया हूँ।

कितने रिश्ते, कितने नुस्ख़े, कितना प्यार,
मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ।

आज 'गली क़ासिम'  से होकर गुज़रा था,
साथ  में   थोड़ी  जन्नत   लेकर  आया  हूँ।

अब 'रौनक़' की बात न करना महफ़िल में,
उसके   दर   से   हिज्रत   लेकर  आया हूँ।

- 'रोहित-रौनक़'

फ़र्रुखाबाद

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 11:44am

जनाब रोहित 'रौनक़' साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'  
मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ'

इस मिसरे में क़ाफ़िया ठीक नहीं "वसीयत"122 है ।

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 10:58am

आदरणीय रोहिताश्व जी आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की पेशकश पे दिली मुबारकबाद. सादर. 

Comment by Mohammed Arif on November 30, 2018 at 1:15pm

आदरणीय रोहिताश्व जी आदाब,

                   बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र माकूल । दिली मुबारकबाद कुबूल करेन । बाक़ी उस्ताद शाइर अपनी राय देंगे , इंतज़ार कीजिए ।

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