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ग़ज़ल नूर की- सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए

सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए
मुहब्बत से अपनी बिछड़ते हुए.
.
समुन्दर नमाज़ी लगे है कोई
जबीं साहिलों पे रगड़ते हुए.
.
हिमालय सा मानों कोई बोझ है
लगा शर्म से मुझ को गड़ते हुए.
.
“हर इक साँस ने”; उन से कहना ज़रूर  
उन्हें ही पुकारा उखड़ते हुए.  
.
हराना ज़माने को मुश्किल न था  
मगर ख़ुद से हारा मैं लड़ते  हुए.
.
ज़रा देर को शम्स डूबा जो “नूर”
मिले मुझ को जुगनू अकड़ते हुए.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:01pm

शुक्रिया आ. बसंत जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:01pm

शुक्रिया आ. अजय जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:01pm

शुक्रिया आ. राज़ साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:01pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Surkhab Bashar on October 29, 2018 at 9:47am

जनाब निलेश नूर साहब,  बहुत उम्दा ग़ज़ल  पढ़ने 

कोमली  मुबारक बाद

Comment by TEJ VEER SINGH on October 29, 2018 at 9:21am

हार्दिक बधाई आदरणीय निलेश "नूर " जी।बेहतरीन गज़ल।

हिमालय सा मानों कोई बोझ है 
लगा शर्म से मुझ को गड़ते हुए.

Comment by Samar kabeer on October 28, 2018 at 10:50pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,दिमाग़ को सुकून अता करती एक बहतरीन ग़ज़ल,हर शैर ख़ास है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Balram Dhakar on October 28, 2018 at 9:52pm

आदरणीय नीलेश जी, एक और बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई!

आपकी ग़ज़लों को पढ़कर दिल खुश हो जाता है।

सभी शे'र पसन्द आये। ख़ासकर ये,

समुन्दर नमाज़ी लगे है कोई 
जबीं साहिलों पे रगड़ते हुए,

एक बार पुनः बधाई।

सादर।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 28, 2018 at 8:58pm

आदरणीय निलेश जी सादर नमस्कार, शानदार गजल हुई है

एक से बढ़कर एक शेर 

कि आनंद आ गया हमको पढ़ते हुए 

Comment by Ajay Tiwari on October 28, 2018 at 6:10pm

आदरणीय निलेश जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

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