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मस्तिष्क और हृदय

मस्तिष्क !
और... हृदय!
जैसे जमी
और आसमान !
जैसे नदी के
दो किनारे !
जैसे--
पूरब और पश्चिम !
इनके बीच
इंसान का,
रफ्ता रफ्ता
पिस जाना ।
जैसे-
दो पाटों के बीच
गेहूं का एक दाना ।
महाभारत से भयावह है
इनके द्वंद का मंजर
अभी बाकी है कुरुक्षेत्र
मेरे भीतर ,,,आपके अंदर !!
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित
(अतुकांत)

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Comment by V.M.''vrishty'' on October 16, 2018 at 9:33pm
आदरणीय डॉ छोटेलाल जी, प्रणाम! मुझे नही पता मेरी रचना आपकी इस तारीफ के काबिल है भी या नहीं। लेकिन अभिभूत हूँ मैं। बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद!
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 16, 2018 at 3:21pm

वाह वृष्टि जी आपकी सुधा वृष्टि से मन अभिभूत हुआ इस कालजयी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by V.M.''vrishty'' on October 14, 2018 at 4:47pm
आदरणीया नीलम जी! रचना तक आने एवं मेरे पुनर्बलन के लिए सादर धन्यवाद!
Comment by Neelam Upadhyaya on October 13, 2018 at 3:54pm

आदरणीया वृष्टि जी। अच्छी अतुकांत कविता की प्रस्तुति। बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2018 at 1:18pm

आद0 वी एम वृष्टि जी सादर अभिवादन। बढिया अतुकांत सृजन हुआ है। बधाई

Comment by Samar kabeer on October 13, 2018 at 11:29am

//आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई//

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन

221      2121   1221    212

//ख़ाक मुट्ठी में उठाते थे, उड़ा देते थे//

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

2122       1122     1122      22

Comment by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 12:05am

आदरणीय समर कबीर जी, आपसे निवेदन है कि क्या आप इन दोनों शेरो के मात्राओ का क्रम बताएंगे?.. क्योकि मेरी समझ के बाहर हो रहा ये।

सादर! शुभ रात्रि!

Comment by Samar kabeer on October 12, 2018 at 9:13pm

जी,ठीक है,प्रयासरत रहें ।

Comment by V.M.''vrishty'' on October 12, 2018 at 4:26pm
आदरणीय समर कबीर जी!
((कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई))

((अपने होने का हम इस तरह पता देते थे
ख़ाक मुट्ठी में उठाते थे, उड़ा देते थे))
इन दो शेर में बह्र ठीक है????
Comment by V.M.''vrishty'' on October 12, 2018 at 3:45pm
आदरणीय समर कबीर जी! हार्दिक धन्यवाद! आपकी नज़र वाकई बहुत पारखी है। आपके सानिध्य में मेरी त्रुटियों में कमी आये तो ये मेरा सौभाग्य है। पुनः आभार!!

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