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भ्रम ... (दो क्षणिकाएं )

भ्रम ... (दो क्षणिकाएं )

लूट कर
नारी की
अस्मत
पुरुष ने
कर लिया
स्वयं को
नग्न
तोड़ दिया
उसकी नज़र में
पुरुषत्व का
भ्रम

2.
कोहराम मच गया
जब दम्भी
पुरुषत्व के प्रत्युत्तर में
हया
बेहया

हो गयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 689

Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 16, 2018 at 12:35pm

आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी सृजन आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on September 16, 2018 at 12:35pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब .... सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार। भ्रम सही है सर।

Comment by Sushil Sarna on September 16, 2018 at 12:34pm

आदरणीया बबितागुप्ता जी आपकी मधुर प्रशंसा से सृजन उपकृत हुआ , हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 16, 2018 at 12:34pm

आदरणीय नरेंद्र चौहान जी सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 16, 2018 at 12:34pm

आदरणीय शेख उस्मानी साहिब , आदाब। ... सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 13, 2018 at 8:25pm

आदरणीय सुशील सरना जी, दोनों क्षणिकाएं एक दुसरे की पूरक और प्रत्युत्तर भी ...बेहतरीन प्रस्तुति... गागर में सागर की तरह!

Comment by Samar kabeer on September 9, 2018 at 7:58pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएं हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'भ्रम' या "भरम"?

Comment by babitagupta on September 8, 2018 at 10:49pm

पुरुषत्व की गरिमा पर प्रहार करती रचना,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सुशील सरजी।

Comment by narendrasinh chauhan on September 8, 2018 at 3:24pm

बहोत खुब सुन्दर रचनाये

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 7, 2018 at 8:26pm

पुरुषत्व के महत्व और उसके अनर्थ पर व प्रत्युत्तर शैली पर बेहतरीन सारगर्भित सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना  साहिब।

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