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ग़ज़ल (हो गई उनकी महरबानी है)

(फाइलातुन _मफाइलुन_फेलुन)

कोई मुश्किल ज़रूर आनी है |
हो गई उनकी महरबानी है |

तिशनगी जो बुझाए लोगों की
तुझ में सागर कहाँ वो पानी है |

और मुझ से वो हो गए बद ज़न
बात यारों की जब से मानी है |

खा गई घर का चैन मँहगाई
उनकी जिस दिन से हुक्म रानी है |

ज़ख्म तू ने दिए हैं ले कर दिल 

जुल की फितरत तेरी पुरानी है |

इंक़लाब आए क्यूँ न बस्ती में
उन पे आई गज़ब जवानी है |

तरके उल्फत करें वही तस्दीक 

मुझको तो दोस्ती निभानी है |

(मौलिक व अप्रकाशित ) 

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Comment

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 22, 2018 at 12:02pm

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब  , ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 22, 2018 at 11:15am

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय...

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 21, 2018 at 10:43am

मुह तरमा नीलम साहिबा, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 21, 2018 at 10:42am

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब  , ग़ज़ल  में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया | तरके इश्क़ करने पर तना फुर का एब हो रहा था इस लिए ऎसा किया | sher5 यूं कर दिया है "ज़ख्म तू ने दिए हैं दिल लेकर __जुल की फितरत तेरी पुरानी है" मक़ते का मिसरा यूँ कर लिया है | "तरके उलफत करें वही तस्दीक  "  सादर 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 21, 2018 at 10:28am

जनाब श्याम नारायण साहिब, ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by Neelam Upadhyaya on June 20, 2018 at 3:25pm

आदरणीय  तस्दीक अहमद जी, नमस्कार।  बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है।  मुबारकबाद कुबूल करें।   

Comment by Samar kabeer on June 20, 2018 at 2:47pm

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

पबचवें शैर में 'बेईमानी' को "बेइमानी" करना मुनासिब नहीं है,अगर असातिज़ा के यहाँ ऐसी कोई मिसाल हो तो बराह-ए-करम पेश करें ।

मक़्ते में 'तर्क-ए-प्यार'  की तरकीब भी ग़लत है,"तर्क-ए-इश्क़" कर सकते हैं ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 20, 2018 at 10:57am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 20, 2018 at 10:48am

जनाब बसंत कुमार साहिब, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 20, 2018 at 10:14am

बहुत खूबसूरत अशआर हुए हैं , आनंद आ गया आदरणीय 

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