... और अब वे वहां भी पहुंच गये! भव्य आदर-सत्कार के बाद उन्हें उनकी पसंद की जगह पहुंचाने पर एक वरिष्ठ मेजबान ने कहा - "सुना है ... टीवी पर देखा भी है कि जिस मुल्क में आप जाते हैं, कोई न कोई वाद्य-यंत्र ज़रूर बजाते हैंं!"
"क्या कहा? कौन सा तंत्र?"
"लोकतंत्र नहीं कहा मैंने! वाद्ययंत्र कहा .. वा..द्ययंत्र!"
"हे हे हे! दोनों अय..कही.. बात हय! यंत्र में मंत्र और तंत्र हय! वाद्ययंत्र कह लो या लोकतंत्र; बजाने में ग़ज़ब की अनुभूति होती है, हे हे हे! बताइए इसे भी बजा कर देख लूं!" इतना कह कर वे बड़ा सा ढोल बजाने लगे!
"अच्छा लगा ना, आपको यह भी!"
"ग़ज़ब का 'गुंजन' और ग़ज़ब की 'हुंकार' मारता है, लोकतंत्र की तरह!" इतना कहकर वे मुस्कराते हुये विशाल जनसमुदाय की जयकारा सुनते हुए अपना हाथ लहराते हुए आगे बढ़े, और फिर उन्हें एक सजे हुए आसन पर विराजमान करा दिया गया।
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
मेरी इस रचना पर गहराई से विचार कर बिंदुवार समालोच्नात्मक टिप्पणियों के लिये और हौसला अफ़ज़ाई के लिए हार्दिक धन्यवाद और आभार आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहिब, डॉ. विजय शंकर जी , जनाब महेन्द्र कुमार जी और आदरणीया बबीता गुप्ता जी।
//"लोकतंत्र नहीं कहा मैंने! वाद्ययंत्र कहा .. वा..द्ययंत्र!"
"हे हे हे! दोनों अय..कही.. बात हय!/// वाह! क्या शानदार व्यंग्य है.
इस बढ़िया लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. सादर.
वर्तमान में लोकतंत्र की व्यवस्था पर व्यंग बाण,प्रस्तुत रचना पर बधाई स्वीकार कीजियेगा.
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,
(1) तीव्र कटाक्ष ।
(2) लोकतंत्र को वाद्य यंत्र समझने या उसे झुनझुना समझकर बजाकर झूठी वाहवही लुटने की ओर इशारा ।
(3) लोकतंत्र को साध्य नहीं अपितु साधन समझना ।
(4) अच्छे पात्रानुकूल संवाद ।
(5) सामयिकता का पुट ।
हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
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