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माथे की बिन्दी

माथे की बिन्दी

कोई ताज़ी भूलें, कुछ नए आँसू

हमारा अब अलसाया-सा बन्धन

ले आता है ओठों पर रूक-रूक एक ही सवाल ---

सुबह से गोधूली तक के अल्प समय में 

तिरछी परछाइयाँ डूबने से पहले ही

मेरे प्यार, भूल गए तुम प्यार की पहचान

तुम कैसे इतने बदल गए ?

समुद्र से करती कोमल-स्पर्श संवेदित हवाएँ

लहरों के ओठ बन्द कर उन्हें सुलातीं थीं जो

उन हवाओं के भी जैसे  मिजाज बदल गए

टूटे विश्वासों की आँचभरी पीर

यह गरीब उन्मन पवन

भय और विह्वलता 

परिचित परिवेष से यह सभी मुझको

कहीं दूर खींच ले जा रहे हैं

डसते अकेलेपन की पथरीली

उदास सो रही गलियों में ---

भ्रान्तियों के भार हैं बढ़ रहे

और ... बढ़ रही है अजाने

बिन चले, जीने की थकान

ढकी हुई गहरी छाहों के बीच अब तुम अदृश्य

चला गया साथ सुंदर सस्मित हमारा वह प्यार भी

मोह का स्वभाव ही  शायद कुछ ऐसा होता है

फटे हुए मन में घावों की पपड़ी कुरेदते

प्यार थक जाता है ....

अपने दायें  हाथ में तुमने एक कांटा चुभोकर

मिट्टी के चबूतरे पर बैठे जो लगाई थी रक्त से

सुनो, पोंछ डाली है मैंने वह माथे की बिन्दी

बह गई है भीग कर तकिए पर

समझ लो उसे अब हमारे प्यार की आहुति

                            -------

--- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on April 11, 2018 at 10:33am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 4, 2018 at 11:20pm

आ.भाई विजय जी इस बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 7:31pm

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय बृजेश जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 4, 2018 at 5:29pm

आपकी हर कविता कुछ न कुछ अतृप्ता का अहसास छोड़ देती है..और यही बड़ी खासियत है मेरी नजर में आदरणीय..एक और बेहतरीन कविता..

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:25am

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय भाई मोहम्मद आरिफ़ जी

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:24am

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर जी

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:24am

 सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय श्याम नारायण जी 

Comment by Mohammed Arif on April 2, 2018 at 7:27pm

आदरणीय विजय नीकोर जी आदाब,

                           बहुत ही.बेहतरीन पेशकश । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on April 2, 2018 at 3:49pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,हमेशा की तरह ये कविता भी प्रभावशाली हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 2, 2018 at 3:19pm
बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय

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