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ग़ज़ल - जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी - अजय तिवारी

मुतफाइलुन   मुतफाइलुन    मुतफाइलुन   मुतफाइलुन
11212         11212          11212         11212

जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी

तभी धूप सुब्ह की गुनगुनी,   उन्हीं सिहरनों पे उतर गयी

 

खिली सरसों फिर से कछार में, भरे रंग फिर से बहार में

घुली खुश्बू फिर से बयार में, कोई टीस फिर से उभर गयी   

 

उसी एक पल में ही जी लिए, उसी एक पल में ही मर गए

वही एक पल मेरी सांस में,  तेरी सांस जब थी ठहर गयी

 

जमी जर्रा-जर्रा थी रात भर, हरी बालियों की जो नोक पर            

उसी ओस जैसी है जिंदगी, जरा-सी हिली कि बिखर गयी

 

तुझे कुछ तो होगा अता पता , फ़कत इतना मुझको तू दे बता

वो जो मेरे हिस्से की थी ख़ुशी, वो अगर गयी तो किधर गयी

 

तू जो कहता है वो है खूबतर, ये है कैसा जादू बता मगर

जो भी चीज आनी थी मेरे घर, वो पलट के तेरे ही घर गयी

 

कभी ठीक से मै जिया नहीं, कभी ध्यान खुद पे दिया नहीं

जो भी करना था वो किया नहीं, युँ ही उम्र सारी गुज़र गयी 

                          मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Ajay Tiwari on March 24, 2018 at 12:24pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Ajay Tiwari on March 24, 2018 at 12:23pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 22, 2018 at 8:19am

आ. भाई अजय जी, खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on March 22, 2018 at 5:59am

आद0 अजय तिवारी जी सादर अभिवादन। बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने, अंदाजे बयाँ का क्या कहना। जादू है। 

जमी जर्रा-जर्रा थी रात भर, हरी बालियों की जो नोक पर            

उसी ओस जैसी है जिंदगी, जरा-सी हिली कि बिखर गयी।

वाह वाह। शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद कुबूल करें, सादर

Comment by Ajay Tiwari on March 21, 2018 at 9:36am

आदरणीय सुशील जी, आपके पुनः उत्साहवर्धन  के लिए हार्दिक धन्यवाद. एक अनुरोध ये कि 'सर' न लिखे, आप हर लिहाज़ से वरिष्ठ हैं. सादर.      

Comment by Ajay Tiwari on March 21, 2018 at 9:26am

आदरणीय समर साहब, आपके आश्वासन के लिए, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Sushil Sarna on March 20, 2018 at 6:40pm

जरा-सा छुआ था हवाओं ने, कि नदी की देह सिहर गयी

तभी धूप सुब्ह की गुनगुनी, उन्हीं सिहरनों पे उतर गयी

वाह क्या बात है ... इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर।

Comment by Samar kabeer on March 20, 2018 at 6:33pm

कोई बात नहीं ।

Comment by Ajay Tiwari on March 20, 2018 at 1:28pm

असावाधनी से 'मौलिक/अप्रकाशित' न लिखा होने की वजह से ग़ज़ल फिर से पोस्ट करनी पड़ी और आप सब की मूल्यवांन प्रतिक्रियाएं रीस्टोर नहीं हो पायीं. इस के लिए आप सब से क्षमाप्रार्थी हूँ.  

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