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कविता- वो आँखें


समय का काला
क्रूर धुआँ
आख़िरकार
तैर गया आँखों में
बन के मोतियाबिंद
बड़ा चुभता है आठों पहर
उन दिनों आँखें
बड़ी व्यस्त रहती थी
किसी के दिल को लुभाती थी
किसी के मन को भाती थी
सारा संसार समाया था इनमें
लेकिन धीरे-धीरे
इनका यौवन फीका पड़ गया
पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा
अब ये आँखें
पथराई-सी
डबडबाई-सी
लाचार-सी रहती है
बस यही पहचान रह गई है इनकी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Views: 773

Comment

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Comment by Mohammed Arif on March 4, 2018 at 6:16pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय मोहित जी ।

Comment by Mohammed Arif on March 4, 2018 at 8:18am

कविता के अनुमोदन और उत्सासवर्धन का बहुत-बहुत आभार आदरणीया रक्षिता सिंह जी ।

Comment by रक्षिता सिंह on March 3, 2018 at 10:35pm

आदरणीय आरिफ जी, नमस्कार

  1. उन दिनों आँखें
    बड़ी व्यस्त रहती थी
    किसी के दिल को लुभाती थी
    किसी के मन को भाती थी।बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ......मुबारकबाद कुबूल करें।
Comment by Mohammed Arif on March 3, 2018 at 4:41pm

रचना के अनुमोदन और उस पर इतनी सुंदर टिप्पणी करने का बहुत-बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by vijay nikore on March 3, 2018 at 2:40pm

//समय का काला
क्रूर धुआँ
आख़िरकार 
तैर गया आँखों में
बन के मोतियाबिंद
बड़ा चुभता है आठों पहर//

इतनी गहराई, इतने सुन्दर भाव, कैसे न पढ़ूँ इसको बार-बार। आनन्द आ गया। आपका धन्यवाद यह मोती-से भाव पोस्ट करने के लिए।

Comment by Mohammed Arif on March 3, 2018 at 12:32pm

कविता के अनुमोदन और हौसला अफज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ।

Comment by Mohammed Arif on March 3, 2018 at 12:31pm

जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 3, 2018 at 10:49am
जी माफ़ी चाहूंगा... कविता ही लिखना था... ख़ूबसूरत कविता के लिए फिर से मुबारक़बाद.
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 3, 2018 at 8:55am

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब ,दिल उतरती सुन्दर कविता हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Mohammed Arif on March 3, 2018 at 8:14am

रचना के अनुमोदन और उत्साहवर्धन का बहुत-बहुत आभार ।

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