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/माँ की चिंता//
''माँ तुम आज फिर,अब तक जाग रही हो? कितनी बार समझा चुकी हूँ कि ठंडी रातों में इतनी देर तक जागना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है।"
फिर से अस्थमा का दौरा पड़ सकता है। तुम समझने का नाम ही नहीं लेती हो!
आई बड़ी समझाने वाली। 'बेटी, मेरी चिंता छोड़, जीना ही कितने दिन है।' और "जिसकी बेटी देर रात तक काम से लौटे उस माँ को नींद कहाँ से आएगी।"
माँ दरवाजे पर ही टकटकी लगाये बैठी थी।
'बेटी तेरा काम क्या है?' कहाँ काम पर जाती है?' किसके घर काम पर जाती...
बेटी ने बीच में ही टोकते हुए 'माँ यह तुम्हारी दवाई गोलियां, इन्हें खाकर सो जाओ, बाकी बाते सुबह करेगें।'
''बेटी सुबह और रात के दरमियां बहुत लंबा फासला है। इस फासले के बीच तुम्हारा अनजान राहों से गुजरना, और खूंखार कुत्तों का तुम पर भौकना! माँ की आँखों में नींद कहाँ से आने देगा।'
'सूरज की रोशनी में चमकने वाले सफेदपोश चेहरे, चांदनी रात में कितने मटमैले हो जाते है।'
'दुनिया का दोगला रूप तुम नहीं जानती हो?'
माँ अगर भैया, अनजान राहों पर न भटके होते तो, और आज घर में होते तो, हमें यह दिन नहीं देखने पड़ते। पर 'तुम चैन से सो जाओ माँ, मेरी राहें अनजान नहीं है।'
'मुझे नर्सिंग होम की नाइट ड्यूटी से, मरीजों की देखरेख से पैसे के साथ साथ तुम्हारी दवाईयां भी निःशुल्क मिल जाती है।'
अब माँ दवाई लेकर चैन की नींद सो रही थी।

विजय जोशी 'शीतांशु'
सचिव म०प्र०लेखक संघ

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Comment by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 12:46pm

आद0 विजय जोशी जी सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 9:02pm

बहुत ही भावपूर्ण कथा कही आदरणीय..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2018 at 5:57pm

अच्छी लघुकथा हुई है आ. विजय जी । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2018 at 5:58pm

जनाब विजय जोशी जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on February 1, 2018 at 8:03am

आदरणीय विजय जोशी जी आदाब,

                             जवान बेटी को लेकर माँ की बेचैनी-व्याकुलता को रेखांकित करती सशक्त लघुकथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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