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221 2121 1221 212

यूँ तीरगी के साथ ज़माने गुज़र गए ।
वादे तमाम करके उजाले मुकर गए ।।

शायद अलग था हुस्न किसी कोहिनूर का ।
जन्नत की चाहतों में हजारों नफ़र गए ।।

ख़त पढ़ के आपका वो जलाता नहीं कभी ।
कुछ तो पुराने ज़ख़्म थे पढ़कर उभर गए।।

उसने मेरे जमीर को आदाब क्या किया ।
सारे तमाशबीन के चेहरे उतर गए ।।

क्या देखता मैं और गुलों की बहार को ।
पहली नज़र में आप ही दिल मे ठहर गए ।।

अरमान भी मिरे थे कि पहुंचेंगे चांद तक ।
इस बेरुखी के दौर में सपने बिखर गए ।।

कुछ खैर ख्वाह भी थे पुराने शजर के पास ।
आयीं जो आँधियाँ तो वो जाने किधर गए ।।

तकदीर हौसलों से बनाने चला था वो ।
आखिर गयी हयात सितारे जिधर गए ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on December 18, 2017 at 10:55pm

बहुत खूब बधाई

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2017 at 6:51pm
Waaaaaaaah bahut sundr srijan sir haardik badhaaèeeeeeeeeee sir
Comment by Samar kabeer on December 16, 2017 at 5:34pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'सारे तमाशबीन के के चेहरे उतर गए'

'तमाश बीन'का अर्थ है,तमाशा देखने वाला,एक वचन,दूसरी बात 'चेहरे'उर्दू के हिसाब से 212 होगा जबकि सही शब्द है "चहरे"22,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'सारे तमाशबीनों के चहरे उतर गए'

'अरमान भी मिरे थे कि पहुंचेंगे चाँद तक'

इस मिसरे में शुतरगुर्बा का दोष है,'मिरे'एक वचन 'पहुंचेंगे'बहुवचन,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं :-

'अरमान था ये मेरा कि पहुँचूँगा चाँद तक'

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 16, 2017 at 7:33am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है।बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 15, 2017 at 5:06pm

आ0 अफरोज सहर साहब शुक्रिया

Comment by Afroz 'sahr' on December 15, 2017 at 2:23pm
आदरणीय नवीन मणि जी अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद के साथ बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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