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ग़ज़ल- एक नेता हर गली कूचे में है।

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122 2122 212
वो कबूतर बाज के पंजे में है।
फिर भी कहता है भले चंगे में है।

हम उसे बूढ़ा समझते हैं मगर,
एक चिन्गारी उसी बूढ़े में है।

ये सियासत आज पहुँची है कहाँ,
एक नेता हर गली कूचे में है।

वो मज़ा शायद ही जन्नत में मिले,
जो मज़ा छुट्टी के दिन सोने में है।

इस सियासत में फले फूले बहुत,
कितनी बरकत आपके धंधे में है।

नींद जो आती है खाली खाट पर,
वो कहाँ पर फोम के गद्दे में है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on December 13, 2017 at 4:15am

आद0 राभ अवध विश्कर्मा जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल का पेश की आपने, शैर दर शैर बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 12, 2017 at 4:42pm

आदरणीय शिज्जु शकूर जी ग़ज़ल सराहना के लिये सादर आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2017 at 3:30pm

आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा सर बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 12, 2017 at 2:18pm

आदरणीय तिवारी जी ग़ज़ल सराहना के लिये आपका सादर आभार

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 12, 2017 at 2:17pm

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी आपका बहुत बहुत आभार

Comment by Ajay Tiwari on December 12, 2017 at 12:53pm

आदरणीय राम अवध जी,

वो मज़ा शायद ही जन्नत में मिले,
जो मज़ा छुट्टी के दिन सोने में है. ....परम सत्य! बहुत खूब. 

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाईयाँ

सादर 

Comment by Gurpreet Singh jammu on December 11, 2017 at 9:38am

वाह ,, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय राम अवध जी

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 9, 2017 at 7:14pm

आदर्णीय तस्दीक़ अहमद साहब ग़ज़ल सराहना के लिये बहुत बहुत आभार

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 9, 2017 at 4:31pm

जनाब राम अवध साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 8, 2017 at 10:11am

आदरणीय श्यामनारायण वर्मा जी। आदाब ।ग़ज़ल सराहना के लिये आपका सादर आभार।

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