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1222 1222 122

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नही हमको जो भाता क्यों करें हम
कोई झूठा बहाना क्यों करें हम

हमीं से रौशनी है चार सू जब
तो बुझने का इरादा क्यूँ करें हम

खमोशी की सदा अक्सर सुनी है
न सुनने का बहाना क्यूँ करें हम

भरोसा जब नहीं खुद पे हमें ही
*वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम*

हो झगड़ा आपसी सुलझाएँ खुद ही
ज़माने में तमाशा क्यों करें हम

न होता झूठ का कोई ठिकाना
फिर उसको ही तराशा क्यूँ करें हम

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 23, 2017 at 4:12pm
आदरणीय बृजेश ब्रज भाई जी ,सादर हार्दिक आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 22, 2017 at 3:21pm
आदरणीय सुरेन्द्र भाई जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए सादर आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 22, 2017 at 3:20pm
आदरणीय समर कबीर जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल शुक्रिया।सादर नमन!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 22, 2017 at 3:18pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ,प्रयास पर उपस्थित होकर उत्साहवर्धन करने के लिए सादर हारदिक आभार। आजकल व्यस्तता अधिक है। इसी वजह से मंच को भी समय नहीं दे पा रहा। यदा कदा समय मिलता है तो ,मंच पर समय दे पाता हूँ। प्रयास रहेगा मंच पर पर्याप्त समय दूँ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 22, 2017 at 3:14pm
वाह वाह आदरणीय बड़ी अच्छी ग़ज़ल हुई..सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 22, 2017 at 3:12pm
आदरणीय नीलेश भाई जी,सादर हार्दिक आभार ,जी आपके सुझाव के अनुसार कोशिश करूँगा सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 21, 2017 at 9:52pm
आदरणीय सलीम रजा साहब,यत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया! सादर
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 1:26pm
आद0 सतविंदर भाई जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर बेहतरीन प्रयास के लिए बधाई कबूल करें। सादर।
Comment by Samar kabeer on September 20, 2017 at 12:10pm
जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on September 20, 2017 at 8:39am
आदरणीय सतविंद्र कुमार जी आदाब, अच्छा प्रयास । बधाई स्वीकार करें । गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।

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