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गजल(आज चढ़ता जा रहा पारा बहुत)

2122 2122 212
आज चढ़ता जा रहा पारा बहुत
मौसमों ने भी लिया बदला बहुत।1

बर्फ पिघली,बह गया पानी कहाँ?
हो गया ऊँचा शिखर बौना बहुत।2

फिर चिरागों ने दबोची रोशनी
वक्त गुजरा याद है आता बहुत।3

नाचघर-सी हो गयी संसद भली
भांड ढुलमुल नाचता-गाता बहुत।4

आसमानों में चढ़ीं दुश्वारियाँ
भाव हीरों का लगा पौना बहुत।5

बदगुमानी का सबब हैं कुर्सियाँ
कर्मियों ने भाड़ ही झोका बहुत?6

पार उतरे वे समंदर के,उड़े,
रह गया है आज पछतावा बहुत।7

रेत बनती जा रही प्यासी जमीं
और सबने और भी खोदा बहुत।8

क्या करेंगे आप मरकर?बोलिये,
आदमी ने लाश को गोदा बहुत।9
'मौलिक व अप्रकाशित'

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Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2017 at 7:43am
आदरणीय गिरिराज भाई, आपका शुक्रिया।परिमार्जन करता हूँ,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2017 at 7:41am
आदरणीय समर जी,आपका बहुत बहुत आभारी हूँ,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2017 at 7:40am
आपका आभारी हूँ आदरणीय सुनील जी।
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2017 at 7:39am
आदरणीय रवि शुक्ल जी,रचना पर आपकी उपस्थिति अपनी खुशी का पर्याय है।आपके सुझाव अमूल्य हैं,परिमार्जन करता हूँ,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2017 at 7:37am
आदरणीय आरिफ भाई,आपका शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 10, 2017 at 6:40pm

आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।
अगर आपने - 2122   2122   212 बह्र मे गज़ल कही है तो --

मतले का सानी बेबह्र हो रहा है -- इसे
मौसमों का रुख भी है बदला बहुत।    रुख - की मात्रा 2 होती है आपने 21 ले  ली है मात्रा

वक्त गुजरा याद अब आता बहुत   - को  --- वक्त गुजरा याद है आता बहुत  ( है , के बिना अर्थ अधूरा है )

बाक़ी बातें आ, रवि भाई कह ही चुके हैं ... ख्याल कीजियेगा ।

Comment by Samar kabeer on August 10, 2017 at 6:01pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।
जनाब रवि शुक्ला साहिब से सहमत हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 10, 2017 at 1:15pm

आदरणीय मनन जी, खूबसूरत गजल कही है, आदरणीय रवि शुक्ल जी की टिप्पणी से मैं भी इत्तफाक रखता हूँ.अंतिम शेर वाकई समझ में नहीं आया.

Comment by Ravi Shukla on August 10, 2017 at 11:33am

आदरणीय मनन जी गजल के लिये मुबारक बाद पेश करते है हालांकि अरकान आप ने नहीं लिखे पर प्रवाह के अनुसार इसके अरकान

2122 2122 212 समझ आए। मतले का सानी इस हिसाब से बहर में नहीं है देखियेगा

फिर चिरागों ने दबोची रोशनी को  इस मिसरे में चिरागो ने दबोचा शायद सही तरकीब हो

हो गये वे आज अनजाना बहुत।7 इस मिसरे में  हो गये आज वे अनजाने होना चाहिये  जिससे काफिया सही नहीं रह जाएगा

अाखिरी शेर के अर्थ तक नहीं पहुँच पाए

बहर हाल 2सरा और 4 था श्‍ोर अच्‍छा लगा । सादर

Comment by Mohammed Arif on August 10, 2017 at 11:09am
नाचघर-सी हो गयी संसद भली
भांड ढुलमुल नाचता जाता बहुत। वाह!वाह!! बहुत ही सामयिक शे'र
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद आदरणीय मनन कुमार जी ।

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