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यह चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है-----पंकज मिश्र

1212 1122 1212 22

मेरे वतन की फ़िज़ाओं में जो मुहब्बत है
इसे बचाऊँ मैं हर हाल, मेरी चाहत है

हिमालया से लगायत महान सागर तक
परम पिता ने लिखी हिन्द की ये आयत है

तमाम लोगों ने कोशिश करी बदलने की
मगर वो हारे, विविधता में इसकी ताकत है

सफ़ेद पगड़ी हरा कुर्ता केसरी धोती
ये चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है

अज़ान भी है भजन भी है चर्च की घण्टी
इसी वजह से वतन अपना खूबसूरत है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2017 at 6:27pm
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, सुझाव सर्वथा उचित है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 6, 2017 at 5:26pm

आदरणीय पंकज भाई , बढ़िया गज़ल हुई है , बधाइयाँ स्वीकार करें । आ. समर भाई की बातों का ख्याल कीजियेगा ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 6, 2017 at 3:54pm
जनाब पंकज साहिब ,अच्छी गज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Samar kabeer on August 6, 2017 at 2:39pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
आख़री शैर में 'राष्ट्र' को "वतन" करना उचित होगा ।

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