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मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

सीलन भरी छत पर बैठकर
चाँद की ख़ूबसूरती को निहारने वाले
मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों
यदि संभव हो
तो अगली बार
भूख़, ग़रीबी, शोषण
और अत्याचार के साथ
इस नफ़रत भरी
विषैली बेल को भी
अपने उपग्रहों में लपेट कर
इस पृथ्वी से दूर
बहुत दूर
सुदूर अन्तरिक्ष में
छोड़ देना तुम
जहाँ से फिर कभी लौटना
संभव न हो
और हाँ
अगर तुम्हारे यान में
थोड़ी सी जगह और बचे
तो बिठा लेना मुझे भी
और फेंक देना रास्ते में
जहाँ कहीं भी तुम्हारा दिल करे!

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:28pm
बधाई हेतु आपका हार्दिक आभार आदरणीया नीलम जी।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:27pm
बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय आशुतोष भाई जी।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:26pm
सादर धन्यवाद आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी।
Comment by Mahendra Kumar on February 21, 2017 at 5:26pm
रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 20, 2017 at 6:35pm
मेरे और बहुत से भारतीयों के 'मन की बात' कहने के लिए सादर हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय महेन्द्र कुमार जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 20, 2017 at 6:35pm
मेरे और बहुत से भारतीयों के 'मन की बात' कहने के लिए सादर हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय महेन्द्र कुमार जी।
Comment by Sushil Sarna on February 20, 2017 at 5:52pm

गहन और यथार्थ भावों की अनुपम अभिव्यक्ति भरी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय। 

Comment by Samar kabeer on February 20, 2017 at 2:08pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 20, 2017 at 12:26pm

बहुत बढ़िया भाई महेंद्र कुमार जी

Comment by Neelam Upadhyaya on February 20, 2017 at 12:04pm

अदरणीय  महेंद्र कुमार जी, बहुत ही बढ़िया विषय वस्तु चुना आपने ।  काश ऐसा वैज्ञानिक कर पाते । बधाई स्वीकार करें ।

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