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ग़ुब्बारों और यथार्थ के बीच (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

सब उड़ान भर रहे थे अपने-अपने 'ग़ुब्बारों' में सवार होकर। कुछ 'धार्मिक कट्टरता' के, कुछ 'अत्याधुनिकता' के कुछ किसी 'राजनीतिक दल' के, कुछ 'उद्योगों' के ग़ुब्बारों में उड़ रहे थे, तो कुछ 'उच्च शिक्षा' और 'उच्च तकनीक' के। जबकि कुछ लोग 'अंधविश्वास' या 'कुरीतियों' या 'भ्रष्टाचार' के ग़ुब्बारों में उड़ रहे थे। कुछ ऐसे भी थे, जो 'दिवास्वप्न' या 'कोरी कल्पनाओं' के ग़ुब्बारों में अनजानी दिशाओं में उड़ते हुए कभी ख़ुश हो रहे थे, कभी उलझ रहे थे।

"तेरा ग़ुब्बारा कौन सा है, तुम क्यों नहीं उड़ते इस युग में औरों की तरह ? क्या दिशा है तेरी इस दशा में ?" एक भावुक, अंतर्मुखी व सामाजिक युवक से उसके अन्तर्मन ने पूछा।

कोई उत्तर न मिलने पर दूसरे प्रश्न किये गये।

"तुम 'आदर्शों', 'आध्यात्म' या 'दर्शन-शास्त्र' के ग़ुब्बारे में उड़ना चाहते हो न?"

इस सवाल पर विचलित होते हुए युवक ने कहा- "वे 'ग़ुब्बारे' नहीं ! 'धरातल' हैं यथार्थ के!"

"तो क्या तुम संत-महात्मा या 'गांधी' बनने की सोच रहे हो, या इस दुनिया के परे जाकर कहीं समाधि लगाने की तैयारी हो रही है?" अन्तर्मन ने व्यंगात्मक लहज़े में कहा।

"मैं आज की सदी का उच्च शिक्षित युवक हूँ! वह सब मैं क्यूँ करने चला?" युवक ने आसमान की ओर देखते हुए कहा- "वे जो उड़ रहे हैं न, वे दिशाहीन हों या न हों, लेकिन यथार्थ के धरातल पर उन्हें एक दिन आना ही होगा!

"तुम्हारी सोच और विचारधारा में विरोधाभास है या टकराव?" अन्तर्मन ने युवक से पूछा।

"ज़मीन और ज़मीर से जुड़े हर शख़्स का यही हाल है! मन विचलित है, ग़ज़ब का उलझाव है!" युवक ने चारों दिशाओं में नज़रें क्रमशः घुमाते हुए कहा।

"मुझे तो लगता है कि तुम 'कर्मशील' और 'न्यायप्रिय' भले हो लेकिन 'आस्तिक' नहीं हो, तभी परेशान रहते हो!"

समालोचना सुन कर युवक बोला- "मैं नास्तिक भी तो नहीं हूँ! "

"तो फिर तुम अपने आपको कैसा समझते हो ? क्या मक़सद है तुम्हारे जीने का?" अन्तर्मन का अगला सवाल था।

कुछ पलों की चुप्पी के बाद वह युवक बड़बड़ा कर बोला- " मैं उन सब लोगों जैसा नहीं हूँ! इन्सान बनने की कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है!"

इन्सान बनने के लिए उसे किसी वैसे ग़ुब्बारे की ज़रूरत नहीं थी। उसे 'इन्सानियत' और अपनी क़ाबीलियत' पर ही भरोसा था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 14, 2017 at 6:50pm
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देकर हौसला अफ़जा़ई हेतु व राय साझा करने के लिए सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्रा जी, जनाब मोहम्मद आरिफ साहब, व आदरणीय प्रतिभा पाण्डेय जी।
Comment by pratibha pande on February 12, 2017 at 10:05pm

आज के माहौल में इंसानियत को ढूढ़ते व्यक्ति का   अंतर्मन से संवाद ...  सुन्दर ताना बाना है ..हार्दिक बधाई आदरणीय उस्मानी जी 

Comment by Mohammed Arif on February 10, 2017 at 6:44pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्नी जी आदाब, बहुत बढ़िया, कटाक्षपूर्ण लघुकथा । बधाई !
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 10, 2017 at 5:44pm
पुनः हौसला अफ़जा़ई के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा जी।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 10, 2017 at 9:34am

आदरणीय शेख जी ..गहन चिंतन को जिन्दगी को उसकी जमीन दिखाती इस शानदार लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई सादर 

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