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झिलमिल तारों सा सपनो के अम्बर में रहते हो क्यों ?

मलयानिल की मधु धारा सा मानस में बहते हो क्यों?

 

रेशम सी शर्मीली आँखे गाथा कहती है मन की

निर्ममता के अभिनय क्षण में अंतर्गत चहते हो क्यों?

 

अंतस में भावों की गंगा यदि पावन है पूजा सी

तो संकल्पों की वर्षा हो फिर पीड़ा सहते हो क्यों?

 

वृन्दावन की वीथी में तुमने ही झिटकी थी बाहें

फिर उन बाँहों को मंदिर की शाला में गहते हो क्यों?

 

प्राणों का रसमय बंधन वह तुमने ठुकराकर तोड़ा  

विरहा की पावक लपटों में अब बेबश दहते हो क्यों?

 

आहों के सरगम पर जीवन जाने है कितने बीते   

तब फिर तुम तटिनी के तट सा राका में ढहते हो क्यों?

 

युग की निष्ठुरता का बाना धारण यदि कर ही डाला

तो सबसे उस मधुचर्या की मृदु बातें कहते हो क्यों ? 

 (मौलिक/अप्रकाशित)

 

 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:17pm

आ० नीलम जी . बहुत शुक्रिया .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:16pm

आ० जयनित जी , बहुत बहुत आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:16pm

आ० सतविंदर जी , अनुग्रहीत हुआ . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:15pm

आ० मिथिलेश जी - आपका स्नेह मेरा हौसला बढाता है. सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2017 at 9:13pm

आ० समर कबीर साहिब . आभारी हूँ कि आपने इतना समय दिया . वर्तनी की गलती मेरी लापरवाही  है  , आहों की सरगम  बिलकुल सही मार्गदर्शन है . सादर . .

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 20, 2017 at 3:17pm

आदरणीय गोपाल सर .सुंदर सुंदर हिंदी के शब्द रूपी फूलों से बना आपका यह ग़ज़ल रूपी गुलदस्ता दिल को छूने वाला है / इस को कई बार गुनगुनाया / आनंद से सराबोर करती इस शानदार हिंदी ग़ज़ल के लिए ढेर सारी शुभकामनायें सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on January 20, 2017 at 1:30pm
बेहद उम्दा ...बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 
Comment by Neelam Upadhyaya on January 20, 2017 at 10:17am

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है. बधाई स्वीकार करें.

Comment by जयनित कुमार मेहता on January 20, 2017 at 5:43am
आदरणीय गोपाल जी, क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने। तत्सम शब्दों के प्रयोग ने रचना में चार चाँद लगा दिए हैं। आदरणीय समर कबीर जी की बातों से सहमत हूँ। हार्दिक बधाई आपको।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 19, 2017 at 11:48pm
आदरणीय गोपाल कृष्ण सर,इस उम्दा गजल के लिए हार्दिक बधाई@

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