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तरही गजल/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 1222 122
चला दुनिया को समझाने जो घर तकरार रखता है
नहीं हैं पूछते अपने वो क्या अधिकार रखता है?

चला है जीतता वो जो,खुदा से प्यार रखता है
भले ही जीत मिलती याद फिर भी हार रखता है

जमीं अपनी नहीं कोई यही लेकिन गुमाँ दिल में
*वो अपनी मुठ्ठियों में बांधकर संसार रखता है!*

लगा क्यों दब गया है वो सभी जुल्मों से अब डरकर?
खमोशी सी है चहरे पे मगर ललकार रखता है।

हमेशा चाहता अच्छा जो भी अपने ही बच्चों का
दिखे है सख्त ऊपर से वो अंदर प्यार रखता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 10, 2017 at 10:46pm
आदरणीय महेंद्र कुमार जी,सुख़न नवाजी के लिए शुक्रिया !यह स्नेह यूँ ही बना रहे!सादर
Comment by Mahendra Kumar on January 8, 2017 at 9:53am
आदरणीय सतविन्द्र जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। मेरी तरफ से ढेरों बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 7, 2017 at 9:17pm
आदरणीय डॉ आशुतोष जी सादर,प्रयास को पसन्द कर हौंसला बढाने के लिए सादर आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 7, 2017 at 9:15pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी सादर,प्रयास को पसन्द कर प्रोत्साहित करने के लिए हार्दिक आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 7, 2017 at 9:13pm
आदरणीय समर कबीर जी सादर नमन!प्रयास आपको पसन्द आया,मुझे हौंसला मिला।बहुत् बहुत् आभार आपका।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 7, 2017 at 5:23pm
आदरणीय सतविंदर जी मुझे यह ग़ज़ल बड़ी सूक्ष्म ऑब्जरवेशन के कारण बेहद पसंद आयी इस ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 7, 2017 at 5:23pm
आदरणीय सतविंदर जी मुझे यह ग़ज़ल बड़ी सूक्ष्म ऑब्जरवेशन के कारण बेहद पसंद आयी इस ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 7, 2017 at 3:13pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने, दाद ओ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं. सादर 

Comment by Samar kabeer on January 7, 2017 at 3:02pm
जनाब सतविन्दर कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं ।

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