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वक़्त होता है सारथी
पथ होता जीवन काल

राह दिखाते चाँद सूरज
मनुष्य हो जाते बेहाल

डम डम डम डम बजाते जो डमरू
क्या बन जाओगे महाकाल

पृथ्वी के जो एक कण से उपजे
अहँकार न बनेगी कभी ढ़ाल ।

नहीं कोई यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम
बनाते फिर भी कई पाल

आईने के सामने खड़े हो जाएँ
तो दिख जाये स्वयं की डाल ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 6, 2016 at 11:01pm
धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश सर ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 6, 2016 at 11:01pm
आदाब जनाब समर साहब । सादर धन्यवाद । आपने ग़ज़ल के लिए कहा है । अभी मुझे मात्राओं में दिक्कत आ रही है । पर प्रयास करूँगी । सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2016 at 10:57pm
आदरणीया कल्पना जी इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई
Comment by Samar kabeer on December 6, 2016 at 8:41pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बहुत सुंदर कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
आपकी इस कविता में क़ाफ़ियों का इस्तेमाल देख कर जाने क्यों ऐसा महसूस हुआ कि अगर आप चाहें तो ग़ज़ल का प्रयास आसानी के साथ कर सकती हैं ।

कृपया ध्यान दे...

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