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चमक धमक

चमक धमक को समझ बैठे
तरक्की की सीढियाँ
चलते रहे चका चौंध के पीछे
इंसानियत को भी गवां बैठे ।


तेज़ रौशनी में छुपे अँधेरे को
समझ न सके पैर डगमगा गए
लोटने का रास्ता भी न मिला
खुद ही खुद को गवां बैठे ।


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 10:10am

आदरणीया कल्पना जी , बाहरी चमक की वर्थता पर अच्छी बात कही , हार्दिक बधाई ।

कुछ शब्दों के हिज्जे सुधार लीजियेगा --

चमक धमक को  चमक दमक
लोटने को लौटने करना उचित होगा

Comment by Samar kabeer on November 27, 2016 at 9:29pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,चन्द शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने,अच्छी लगी आपकी लघु कविता,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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