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घुला हुआ है
वायु में,
मीठा-सा  विष गंध

जहां रात-दिन धू-धू जलते,
राजनीति के चूल्हे
बाराती को ढूंढ रहे  हैं,
घूम-घूम कर दूल्हे

बाँह पसारे
स्वार्थ के
करने को अनुबंध

भेड़-बकरे करते जिनके,
माथ झुका कर पहुँनाई
बोटी-बोटी करने वह तो
सुना रहा शहनाई

मिथ्या-मिथ्या
प्रेम से
बांध रखे इक बंध

हिम सम उनके सारे वादे
हाथ रखे सब पानी
चेरी, चेरी ही रह जाती
गढ़कर राजा-रानी

हाथ जले हैं
होम से
फँसे हुये हम धंध।
----–-------
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 5, 2016 at 9:46pm
वाह बहुत ही सुन्दर रचना
Comment by रमेश कुमार चौहान on November 5, 2016 at 7:46pm
आदरणीय कबीर जी सादर आभार
Comment by Samar kabeer on November 5, 2016 at 2:33pm
जनाब रमेश कुमार चौहान साहिब आदाब,बहुत बढ़िया लगा आपका नवगीत,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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