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रिश्तों के सीनों में ......

रिश्तों के सीनों में ......

कितनी सीलन है
रिश्तों की इन क़बाओं में

सिसकियाँ
अपने दर्द के साथ
बेनूर बियाबाँ में
कहकहों के लिबासों में
रक़्स करती हैं

न जाने
कितने समझौतों के पैबंदों से
सांसें अपने तन को सजाये
जीने की
नाकाम कोशिश करती हैं

ये कैसी लहद है
जहां रिश्ते
ज़िस्म के साथ
ज़मीदोज़ होकर भी
धुंआ धुंआ होती ज़िन्दगी के साथ
अपने ज़िन्दा होने का
अहसास देते हैं
घुटते हैं
फिर भी आवाज़ देते हैं

ए अजल !
ज़िस्म को तू
बेआवाज़ कर देती है
हर दर्द का
इंसाफ़ कर देती है
फिर क्यूँ छोड़ देती है
अपने पीछे
पारा पारा* होते *(पारा पारा =टुकड़ा टुकड़ा )
रिश्तों के सीनों में
ज़ख्मों को
ज़िंदगीभर
रिसने के लिए

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 615

Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 6, 2016 at 2:08pm

आदरणीया कांता रॉय जी प्रस्तुति को इतनी आत्मीयता से सराहने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया। सृजन आपके इस मान से उपकृत हुआ। 

Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 3:01pm
ये कैसी लहद है
जहां रिश्ते
ज़िस्म के साथ
ज़मीदोज़ होकर भी
धुंआ धुंआ होती ज़िन्दगी के साथ
अपने ज़िन्दा होने का
अहसास देते हैं
घुटते हैं
फिर भी आवाज़ देते हैं------ दिल को विह्वल कर गई है आपकी यह कविता आदरणीय सुशील सरना जी। बहुत बहुत बधाई आपको।
Comment by Sushil Sarna on September 4, 2016 at 11:29am

आद. Alka Changa जी  प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय सराहना का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 3, 2016 at 4:22pm

सुन्दर कविता

Comment by Sushil Sarna on September 3, 2016 at 3:00pm

आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan साहिब सृजन को अपनी आत्मीय प्रशंसा से अलंकृत करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on September 3, 2016 at 2:58pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति की  अपने शीरीं लफ़्ज़ों से ताज़पोशी करने का दिल की गहराईयों से शुक्रिया। आपका प्रोत्साहन सदा बन्दे को नए सृजन के लिए उत्साहित करता है। हार्दिक हार्दिक आभार। 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 2, 2016 at 9:51pm

मोहतरम सुशील सरना साहिब , दिल की गहराईयों में अपना असर छोड़ती सुन्दर कविता के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 9:17pm
जनाब सुशील सरना साहिब आदाब,बहुत सुंदर कविता हुई है, आपने अपने अहसासात को खूबसूरत अल्फ़ाज़ का जामा पहना दिया है, सोचने पर मजबूर करती है ये कविता और मेरा ऐसा मत है कि जो रचना पाठक को सोचने पर विवश कर दे वो बहतरीन होती है,ढेरों बधाई स्वीकार करें इस शानदार प्रस्तुति पर ।
Comment by Sushil Sarna on September 2, 2016 at 12:16pm

आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय सराहना का तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 9:47am

बहुत खूब ! आदरनीय सुशील भाई बहुत अच्छी लगी आपकी कविता । हार्दिक बधाइयाँ ।

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