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यादें....

यादें भी
कितनी बेदर्द
हुआ करती हैं
दर्द देने वाले से ही
मिलने की दुआ करती हैं
अश्कों की झड़ी में
हिज्र की वजह
धुंधली हो जाती है
चाहतों के फर्श पर
आडंबर की काई
बिछ जाती है
दर्दीले सावन बरसते रहते हैं
फिसलन भरी काई पर
अश्क भी फिसल जाते हैं
अब सहर भी कुछ नहीं कहती
अब दामन में नमी नहीं रहती
ज़माने के साथ
प्यार के मायने भी
बदल गए हैं
अब प्यार के मायने
नाईट क्लब के अंधेरों में
सिमट गए हैं
ईट,ड्रिंक एंड एन्जॉय का
चलन प्यार पर भारी है
वासना की नदी में
सच्चाई भी हारी है
दिखावा तो पल भर का
हुआ करता है
ढाई अक्षर में
एक युग हुआ करता है
जिस्मों के लम्हे तो
फ़ना हो जाते हैं
जीते वही हैं
जो दिलों में निहाँ हुआ करते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 9:06pm

आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण' जी प्रस्तुति में निहित भावों को अपनी स्नेहिल प्रशंसा से मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 1, 2016 at 5:47pm
फिसलन भरी काई पर
अश्क भी फिसल जाते हैं ।
वाह! आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुन्दर रचना।बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 1:27pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी प्रस्तुति में निहित भावों को अपनी स्नेहिल प्रशंसा से मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 1, 2016 at 7:05am
यादें भी कितनी बेदर्द होती है ।वाह । हार्दिक बधाई आदरणीय सुशिल जी ।

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