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धूप सर पर चढ़ी है सावन में
तिश्नगी हर घड़ी है सावन में

आँखें भीगीं हैं और लब सूखे
आंसुओं की झड़ी है सावन में

जेठ की सोने-चाँदी सी धरती,
हीरे-मोती जड़ी है सावन में

तुझको देखूँ कि इन बहारों को
सामने तू खड़ी है सावन में

बादलों! अब न भाग पाओगे
हाँ, सुरक्षा कड़ी है सावन में

सूख जाएं न फिर ये अश्क़ मेरे
इसलिए हड़बड़ी है सावन में

दो किनारों को फिर मिलाने "जय",
इक नदी चल पड़ी है सावन में

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 1, 2016 at 9:30am

आदरणीय जयनित भाई , खूबसूरत श्रावणी गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ आपको

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 29, 2016 at 11:29am

आ0 भाई जयनित जी सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by जयनित कुमार मेहता on July 28, 2016 at 9:22pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी, ग़ज़ल की सराहना के लिए शुक्रगुज़ार हूँ आपका।
Comment by जयनित कुमार मेहता on July 28, 2016 at 9:21pm
आदरणीय अशोक जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई इसका अर्थ यह हुआ कि मेरा प्रयास सफल हुआ है। रचना पर उपस्थित होकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद। सादर।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on July 28, 2016 at 9:19pm
आदरणीय समर कबीर जी, आपकी प्रतिक्रिया से आत्मिक ख़ुशी की अनुभूति हो रही है। बहुत बहुत धन्यवाद आपको। सादर।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on July 28, 2016 at 9:17pm
आदरणीया आभा जी, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभारी हूँ।
Comment by Ravi Shukla on July 28, 2016 at 3:59pm

आदरणीय जयनित कुमार  जी  बहुत अच्‍छी  गजल कही है. मुबराक बाद हाजिर है 

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2016 at 3:37pm

आदरणीय जयनित कुमार मेहता जी सादर, बहुत खूबसूरत गजल कही है. मतले से मक्ते तक सभी अशआर मनभावन हैं और इस एक शेर  का तो कहना ही क्या.

बादलों! अब न भाग पाओगे
हाँ, सुरक्षा कड़ी है सावन में

बहुत-बहुत बधाई.सादर.

Comment by Samar kabeer on July 28, 2016 at 3:03pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत सुंदर और मनभावन ग़ज़ल हुई है सावन में,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
Comment by Abha saxena Doonwi on July 28, 2016 at 8:18am

वाह बहुत सुंदर ग़ज़ल लिखी है आपने बधाई :)

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