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बाला छंद ,वर्ण वृत्त (मुक्तक )

२१२ २१२ २१२ २

आदमी आदमी का सहारा

एक साथी बिना क्या गुजारा

गीत को साज भी है जरूरी

नाव भी ढूँढती है किनारा  

 

धूप है तो यहाँ छाँव भी है

राह के बीच में ठाँव भी है

सोचता क्या चला आ बटेऊ

खेत है पास में गाँव भी है

 

शान्ति के मार्ग जाऊँ कहाँ से

ज्ञान का दीप लाऊँ कहाँ से

लोभ ने मोह ने राह रोकी

मोक्ष मैं  आज पाऊँ कहाँ से

 

देश में बीज क्या बो रहे हैं

क्यूँ बुरे हादसे हो रहे हैं

एक है काटता दूसरे  को

पेड़ ये देख के रो रहे हैं

 

हाथ में फूल भी तीर भी हो

दूध में छाछ भी खीर भी हो

एक दूजे बिना हैं अधूरे

आँख में लाज भी नीर भी हो

 

मौलिक एवं अप्रकाशित  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 30, 2016 at 6:23pm

जी आद० गोपाल भाई जी,ग़ज़ल में जिन्हें हम  रुक्न कहते हैं छंदों में वर्ण समूह होते हैं यहाँ इस छंद में ख़ास बात ये है कि इसमें २ को ११ नहीं कर सकते अतः दीर्घ की ही बंदिश है आपको छंद पसंद आया बहुत- बहुत आभार आपका| 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 30, 2016 at 6:16pm
आआ० दीदी क्या यह
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2------------------------- नहीं है . बाला छंद कभी सुना ही नहीं. इसके बारे में विस्तार से बताइए
आपकी कविता उत्कृष्ट है . खासकर यह पंक्ति - एक दूजे बिना हैं अधूरे आँख में लाज भी नीर भी हो

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 29, 2016 at 12:15pm

आदरणीय समर भाई जी ,अपनी प्रतिक्रिया से रचना का मान बढ़ाने के लिए तहे दिल से शुक्रिया सादर |

Comment by Samar kabeer on July 28, 2016 at 3:33pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,इस सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 9:17pm

आद०  श्याम नारायण वर्मा  जी ,आपको छंद पसंद आये दिल से बहुत बहुत आभार आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 9:17pm

आद०  सुशील सरना जी ,आपको छंद पसंद आये दिल से बहुत बहुत आभार आपका |

Comment by Shyam Narain Verma on July 27, 2016 at 4:01pm

बहुत सुन्दर भावों से सजी रचना बहुत 2 बधाई

सादर

Comment by Sushil Sarna on July 27, 2016 at 1:54pm

हाथ में फूल भी तीर भी हो
दूध में छाछ भी खीर भी हो
एक दूजे बिना हैं अधूरे
आँख में लाज भी नीर भी हो

वाह आदरणीया राजेश कुमारी जी भावों की बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है। इस मधुर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

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