For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दिल-ऐ-बिस्मिल में ...

दिल-ऐ-बिस्मिल में ...

कुछ भी तो नहीं बदला
नसीम-ऐ-सहर
आज भी मेरे अहसासों को
कुरेद जाती है
मेरी पलकों पे
तेरी नमनाक नज़रों की
नमी छोड़ जाती है
कहाँ बदलता है कुछ
किसी के जाने से
बस दर्द मिलता है
गुजरे हुए लम्हात की मरकदों पे
यादों के चराग़ जलाने में
और लगता है वक्त
लम्हा लम्हा मिली
अनगिनित खराशों को
ज़िस्म-ऐ-ज़हन से मिटाने में
अपनी ज़फा से तुमने
वफ़ा के पैरहन को
तार तार कर दिया
आरज़ू के हर अब्र को
शर्मसार कर दिया
स्याह रात में
तारे तो आज भी टूटते हैं
मगर दिल में अब उनसे
किसी मन्नत की ख़्वाहिश नहीं उठती
अब शब-ऐ-हिज़्राँ
करवटों में गुजरती है
यादों के जज़ीरों पर
कोई आशना सी परछाईं
रक़्स करती है
चराग़-ऐ-शरर
तारीकियों से बात करती है
हर सू इक चुप सी
महसूस होती है
अब दिल-ऐ-बिस्मिल में भी
कोई शोर नहीं होता
हर अहद दम तोड़ देती है
सायों का जिस्मों पर जोर नहीं होता
उम्र गुज़र जाती है
किसी के करीब जाने में
मगर जाने वाले पे
किसी का जोर नहीं होता

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 492

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Samar kabeer on June 3, 2016 at 10:08pm
मेरे कहे को इज़्ज़त देने के लिये आपका शुक्रिया ।
Comment by Sushil Sarna on June 3, 2016 at 9:05pm

आदरणीय सौरभ सर आपका आदेश सर आँखों पे। मैं इस रचना को पुनः संशोधित कर अनुमोदनार्थ प्रेषित करता हूँ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2016 at 7:43pm

आदरणीय सुशील सरना जी, आप अपनी इस रचना मे स्वयं ही संशोधन कर, इसके पुनः अनुमोदित हो जाने की प्रतीक्षा करें

सादर

Comment by Sushil Sarna on June 3, 2016 at 7:04pm

पाठक मित्रों से अनुरोध ...

कृपया आ. समर साहिब के सुझाव को अमल में लाते हुए अनुरोध है कि निम्न पंक्तियों को इस प्रकार पढ़ें :

ज़िस्म-ऐ-ज़हन से मिटाने में ... (जिस्म-ओ-ज़हन से मिटाने में )
अब शब-ऐ-हिज़्राँ ... (शब-ए-हिज़्राँ)
अब दिल-ऐ-बिस्मिल में भी ... (दिल-ए-बिस्मिल)

धन्यवाद

Comment by Sushil Sarna on June 3, 2016 at 6:57pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब प्रस्तुति रुहानी तारीफ़ का दिल से शुक्रिया। आप का सुझाव सर माथे ... आपने बिलकुल सही फ़रमाया .... मैं अपनी मूल रचना में इस सुधार को समाहित कर लूँगा। आपकी सूक्ष्म दृष्टि और अमूल्य सुझाव का पुनः आभार।

Comment by Samar kabeer on June 3, 2016 at 2:44pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,हमेशा की तरह खूबसूरत और शानदार रचना हुई है, दिल से बधाई स्वीकार करें । 'जिस्म-ए-ज़हन से मिटने में'इस पंक्ति को इस तरह लिखें"जिस्म-ओ-ज़हन से मिटाने में"
एक बात और इज़ाफ़त का इस्तेमाल में 'ऐ'की जगह सिर्फ़ "ए",लगाया करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service