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उफ़ अपनी चाहत का पन्ना बन बैठा रद्दी अखबार

चाहा था रामायण होता अपने सपनों का संसार
उफ़! अपनी चाहत का पन्ना, बन बैठा रद्दी अखबार

श्रद्धानत हो शीश झुकाते
उस पर तुलसी पत्र चढ़ाते,
मन मंदिर में प्रेम भाव ले
पुष्पों का शृंगार सजाते,
मन के भाव ज़रा भटके तो, रिश्तों में खटका व्यवहार...

शंखनाद सी गूँजा करती
थी मन में आवाज़ तुम्हारी,
संयम नेह झलकता था तब
बात तुम्हारी थी हर प्यारी,
चीखमचिल्ली चुभती बातें, करतीं बस अब तो चीत्कार...

कुछ हम भूले कुछ तुम भूले
गठबंधन के पावन वादे,
सिया राम जैसी निष्ठा के
भूल गए हम सभी इरादे,
पत्थर और ईंटो में अब तो, नाप तोल कर है व्यापार...

किसको यह परवाह सँजोए
नाज़ुक फूलों से भावों को,
सच्चा जब साबित करना हो
अपने सब झूठे दावों को,
ऐसे में तो शब्द अर्थ सब, करते हैं बस हाहाकार...

मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 25, 2016 at 6:43pm

आदरणीया प्राची जी , बहुत बढिया गीत रचना हुई है ! गीत का मुखड़ा बहुत बढिया लगा , आपको हार्दिक बधाइयाँ

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 24, 2016 at 4:38pm

बेहद सुन्दर सरस 

Comment by vijay nikore on April 24, 2016 at 4:17pm

//चाहा था रामायण होता अपने सपनों का संसार
उफ़! अपनी चाहत का पन्ना, बन बैठा रद्दी अखबार// ... बहुत अच्छी ताज़गी है इस भाव में।

सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Ravi Shukla on April 24, 2016 at 3:43pm
आदरणीया प्राची जी सुन्दर गीत रचना के लिए बधाई ।
Comment by Samar kabeer on April 24, 2016 at 2:27pm
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,इस सुंदर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by kanta roy on April 23, 2016 at 11:53pm

शंखनाद सी गूँजा करती
थी मन में आवाज़ तुम्हारी,
संयम नेह झलकता था तब
बात तुम्हारी थी हर प्यारी,
चीखमचिल्ली चुभती बातें, करतीं बस अब तो चीत्कार... बेहद खुबसूरत  रचना  है  ये  आपकी  आदरणीया प्राची  जी , समस्त पद अलौकिक सौंदर्य को  स्वयं  में  समेटे  हुए  है , मोती  जैसे शब्दों  को  भावों के  धागे  में  पिरोया  है ,  पढ़कर  मन  एकदम  से  चकित हुआ ,ह्रदय  से  बधाई  प्रेषित  है  आपको . 

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