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2212 121 1222 212

इतना कमाल हुस्न, दिखाया ही किसलिये।
होनी नही थी बात, बुलाया ही किसलिये।।

मौका नहीं था देना, इबादत का ग़र हमें।
बुत से भला नक़ाब, हटाया ही किस लिये।।

सुननी नहीं थी तुमको, अगर मेरी आरज़ू।
फिर नाम का भजन ये, सिखाया ही किसलिये।।

हम भूल ही गये थे, कि लेनी है साँस भी।
जब मारना ही था तो, जिलाया ही किसलिये।।

अरमान सब थे दफ़्न, सुकूँ में बहुत थे हम।
बर्बाद गुल था करना, खिलाया ही किसलिये।।

मौलिक तथा अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 8, 2016 at 10:55pm
आदरणीय मिथिलेश सर सादर धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 7, 2016 at 12:26am

बहुत खूब 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 6, 2016 at 8:50am
आदरणीय समर कबीर सर संशोधन कर दिया है, सादर।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2016 at 7:13pm
आदरणीय समर कबीर सर, सादर प्रणाम। सुझाव के अनुरूप आगे से उचित शब्द ही प्रयुक्त होगा। सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2016 at 7:12pm
आदरणीय तेजवीर सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2016 at 7:12pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर, सादर धन्यवाद
Comment by Samar kabeer on March 5, 2016 at 6:00pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही आपने शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
आख़िरी शैर, में सही शब्द "दफ़्न"है, आपकी जानकारी के लिये बता रहा हूं
Comment by TEJ VEER SINGH on March 5, 2016 at 3:44pm

हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज मिश्र जी!बेहतरीन गज़ल!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2016 at 11:23am

बहुत ही लाज़वाब हार्दिक बधाई पंकज भाई

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