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तू ग़ज़ल लिखे चाहे जो बह्र, अशआर में वो ज़ुरूर है।।(ग़ज़ल इस्लाह के लिये)

कोई हर्फ़ लब पे न हो भले, इज़हार में वो ज़ुरूर है।
तू ग़ज़ल लिखे चाहे जो बह्र, अशआर में वो ज़ुरूर है।।

ये भी खूब है हाँ खूब है, मुरझा रहे हो तुम यहाँ।
जिस हुश्ने उपवन की तलब, हाँ बहार में वो ज़ुरूर है।।

जो कभी गले से मिला नहीं, सर वो ही शानों पे ढूँढता।
तू गज़ब सितम खुद पर करे, तेरी हार में वो ज़ुरूर है।।

यहाँ रात का पल जल रहा, वहाँ ख़्वाब नैनों में पल रहा।
जो पिघल रहा तेरी आँखों से, मिला प्यार में वो ज़ुरूर है।।

ये खुली पलक दहलीज़ पर, यूँ ही बैठ राहें निहारना।
यूँ ही जागना बिल्कुल ग़लत, मनुहार में वो ज़ुरूर है।।

मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 10, 2015 at 12:42am

सीधी बात : क्या आपने ओबीओ के पाठकों को अपना पीए समझ लिया है जो ऐसे किसी पोस्ट पर कोमेंट कर आपको सूचित करें ?

आप इस मंच पर उपलब्ध ग़ज़ल सम्बन्धित सभी आलेख पढ़ जाइये और फिर रचनाकर्म के प्रति उत्सुक होइये, भाईसाहब

शुभेच्छाएँ

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 10, 2015 at 12:10am

आदरणीय सौरभ पाण्डेय सर मैं मिसरों के बह्र का चयन नहीं करता; बस सीधे जो ख्याल आते जाते हैं उन्हें सीधे मोबाइल पर टाइप करता हूँ; कागज पर नहीं लिखता; एक बार पढता हूँ और पोस्ट कर देता हूँ।।
जब कोई सुझाव आता है तो उसे संशोधित कर लेता हूँ।।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 9, 2015 at 11:55pm

मिसरों के बहर का चयन कैसे करते हैं पंकज वात्स्यायनजी ?

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2015 at 9:38pm
आदरणीय मिथिलेश सर और धर्मेन्द्र सिंह सर आप दोनों लोगों को यथोचित अभिवादन
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 9, 2015 at 5:47pm

बढ़िया प्रस्तुति के लिए दाद कुबुल करें आदरणीय पंकज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 9, 2015 at 5:17pm

आदरणीय पंकज जी बढ़िया प्रस्तुति हुई है हार्दिक बधाई सादर 

कृपया ध्यान दे...

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