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ग़ज़ल : मिल-जुलकर रहती है सो चींटी भी ज़िन्दा है

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

अपनी ताक़त के बलबूते हाथी ज़िन्दा है

मिल-जुलकर रहती है सो चींटी भी ज़िन्दा है

 

कैसे मानूँ रूठ गया है मेरा रब मुझसे

मैं ज़िन्दा हूँ, पैमाना है, साकी ज़िन्दा है

 

सारे साँचे देख रहे हैं मुझको अचरज से

कैसे अब तक मेरे भीतर बागी ज़िन्दा है

 

लड़ते हैं मौसम से, सिस्टम से मरते दम तक

इसीलिए ज़िन्दा हैं खेत, किसानी ज़िन्दा है

 

सबकुछ बेच रही, मानव से लेकर ईश्वर तक

ऐसे थोड़े ही दुनिया में पूँजी ज़िन्दा है

 

आग बहुत है तुझमें ये माना ‘सज्जन’ लेकिन

ढूँढ़ जरा ख़ुद में क्या तुझमें पानी ज़िन्दा है

---------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2015 at 10:22pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Jaynit जी

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 4, 2015 at 7:27pm

अति सुन्दर, 'सज्जन" जी..

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कान्ता जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गुमनाम साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:12pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:12pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुशील जी

Comment by kanta roy on September 3, 2015 at 11:02pm

वाह !!! क्या  जिन्दा रहने की मिशाल दी है आपने ,बहुत खूब लिख गए आप आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार जी। मिलजुल कर रहने को प्रेरणात्मक दिशा दे गये । बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 6:12pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, बहुत ही लाजवाब और शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं.

कृपया ध्यान दे...

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