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नसरी नज़्म :- तन्क़ीद निगार

तनक़ीद निगार
अच्छा भी,बुरा भी
अच्छा इसलिये कि वो
हमें हमारी ख़ामियाँ बताता है
हमें सही सम्त (दिशा) देता है
लेकिन जब यही तनक़ीद निगार
प्रोफ़ेश्नल,कारोबारी,हो जाता है
तब ये तख़लीक़ के
महासिन नहीं देखता
उस तख़लीक़ में
धड़कता दिल नहीं देखता
उसकी नज़र सिर्फ़ और सिर्फ़
ऐब तलाश करती है
उस तख़लीक़ में
जो शाईर की,कवि की,
लेखक की,मुसन्निफ़ की
अपनी जागीर है
वो इसमें ऐब निकालकर,कीड़े निकालकर
ख़त्म कर देता है
उस महल को जो ख़यालों में बना था
बिखेर देता है,
तन्क़ीद निगार
अच्छा भी बुरा भी !

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 8:44pm

बहुत ही सुन्दर और सार्थक नज्म हुयी है आ० समर सर! हार्दिक बधाई!

Comment by Neeraj Neer on May 5, 2015 at 7:39pm

वाह बहुत सुंदर ... 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2015 at 5:44pm

बिलकुल ठीक फ़रमाया आपने ....
नज़्म अपनी बात पहुँचा रही है ..बधाई 
सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 5, 2015 at 10:58am
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार, अभी अभी आपकी नज्म तनक़ीद निगार पढ़ी। विषय गम्भीर है, आलोचना स्वयं में एक बड़ा महत्वपूर्ण विषय है, आलोचक होकर काम करना भी सरल नहीं है , आलोचक किसी रचना में जो है उसे छोड़ वह ढूंढता है जो नहीं है , नतीज़तन , जो है , उसका लुफ्त तो उठा नहीं पाता और मीन मेख निकालने में ही रह जाता है। गलतियां ढूंढता रहता है, डरता रहता है कि कहीं कोई गलती गलती से रह न जाए , कोई और ढूंढ लें और उस पर सही ढंग से काम करने का इल्जाम लग जाए. हाय, गलती ढूंढने में गलती। बहुत से अधिकारियों के ट्रेनिंग पाठ्य क्रम में फाल्ट फाइंडिंग ( fault finding ) एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, कहना न होगा , उसमें प्रशिक्षणार्थी गलती कर जाते हैं , यह भी कहा जाता है कि जो अफसर किसी भी काम में गलती न निकाल पाये वो कैसा अफसर।
फिर आपने पेशेवर आलोचकों का जिक्र किया है , मजबूर हैं, वैसे उन्हें भी गलती निकालने की आलोचना सुननी पड़ती है. मजबूरी है.
रचना-कर्म के पीछे कितने और कैसे कैसे दर्द छिपे हैं , आलोचल वह नहीं देख पाता हैं, अपने काम इतना मशगूल रहता है. आप सफाई भी दें , पर कहाँ सुनता है।
वैसे मेरा अपना सोंचना कुछ यों है कि जब कुछ लिख दिया तो लिख दिया और वह छप गया तो फिर वह मेरा कम पाठकों का अधिक हो गया। वे आपस में ही तय करलें कि किस लायक है , सिर्फ आलोचक पर तो नहीं छोड़ी जा सकती कोई रचना , वह भी जनतंत्र में।
आपको इस नज़्म के लिए बधाई, बहुत काबिले तारीफ़ है, सादर।
Comment by मनोज अहसास on May 5, 2015 at 10:44am
आदाब सर पूरी nazam कई बार पढ़ी कुछ समझा कुछ नहीं
उर्दू नहीं आती ना
नसरी nazam में भी कोई बहर होती है क्या ये थोडा बता दे
मेरे ख्याल से तो ये मुक्त छंद वाली अतुकांत कविता जैसे ही होती होगी
भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई

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