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बह्र : २२ २२ २२ २

 

जीवन में कुछ बन पाते

हम इतने चालाक न थे

 

सच तो इक सा रहता है

मैं बोलूँ या वो बोले

 

पेट भरा था हम सबका

भूख समझ पाते कैसे

हारेंगे मज़लूम सदा

ये जीते या वो जीते

 

देख तुझे जीता हूँ मैं

मर जाता हूँ देख तुझे

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(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2015 at 10:19am

शुक्रिया उमेश कटारा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2015 at 10:18am

बहुत बहुत शुक्रिया आ.  Nilesh Shevgaonkar जी। इस तरह का काफ़िया बिना रदीफ़ के लेकर एक प्रयोग करने की कोशिश भर की है।

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 21, 2015 at 11:03pm
बहुत खूब , बहुत सुन्दर , आदरणीय धर्मेन्द्र जी , बधाई,
Comment by मनोज अहसास on April 21, 2015 at 9:11pm
सर हम तो अभी सीख ही रहे है
थोडा ये बता दे की क्या बिना तुकांत के भी काफ़िया होता है और रदीफ़ कहाँ है इस ग़ज़ल में
समझ नहीं आया इसी लिए पूछ रहे है
कृपा करके सरल उत्तर दे
सादर निवदन

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 21, 2015 at 8:50pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, चकित करते काफिया वाली सुन्दर ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 20, 2015 at 3:16pm

बहुत सुन्दर !! भाई धर्मेन्द्र जी , आपको हाद्रिक बधाइयाँ , ग़ज़ल के लिये ॥

Comment by वीनस केसरी on April 20, 2015 at 3:09am

बहुत खूब भाई ..

Comment by Samar kabeer on April 19, 2015 at 10:26am
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें |
Comment by umesh katara on April 18, 2015 at 7:26pm

वाह वाह अच्छा प्रयास है बधाई हो

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2015 at 6:43pm

बहुत ख़ूब. 
मक्ता बेहद शानदार हुआ है. ग़ैर मुरद्दफ़ पर मात्रिक काफ़िया उलझन पैदा कर रहा था..
बधाई 
सादर  

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