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ग़ज़ल -- बूँद भी नहीं मिलती...... (मिथिलेश वामनकर)

212---1222---212---1222

 

धूप भी नहीं मिलती छाँव भी नहीं मिलती

ताकतों के साए में ज़िन्दगी नहीं मिलती

 

ज़िन्दगी मुकम्मल हो ये कभी नहीं मुमकिन 

गर मिले समंदर तो तिश्नगी नहीं मिलती

 

आसमां सियासत से रूबरू हुआ जबसे

चाँद भी नहीं मिलता चांदनी नहीं मिलती

 

जाम के हवाले से दो जहां उठा लाया

मैकशी के आलम में बूँद भी नहीं मिलती

 

मत करो कदमबोसी दूरियां जरूरी है

ज्यूं तले  चरागों के रौशनी नहीं मिलती

 

बात में सचाई हो, रूह में खुदाई हो

आदमी नहीं जिसमें कुछ कमी नहीं मिलती

 

धुंध ये अजीयत की, खा गई नसीबों को

हाथ की लकीरें भी साफ़ सी नहीं मिलती

 

हसरतों के साये में बेकफन मरासिम है

आँख का मरा पानी अब नमी नहीं मिलती

 

------------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 8:54pm

मत करो कदमबोसी दूरियां जरूरी है

ज्यूं तले  चरागों के रौशनी नहीं मिलती     वाह! वाह! वाह! लाजव़ाब! मेरी नजर में आप का अब तक का मेरा पढ़ा सबसे सुन्दर शेर!

सुंदर गजल पर ढेरों बधाईयां!!आदरणीय!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 23, 2015 at 8:23pm

वाह वाह बहुत शानदार ग़ज़ल हुई मिथिलेश भैया,एक भी शेर दुसरे से कमतर नहीं  फिर भी ये तो बहुत ही ज्यादा पसंद आये 

ज़िन्दगी मुकम्मल हो ये कभी नहीं मुमकिन 

गर मिले समंदर तो तिश्नगी नहीं मिलती-----शानदार 

 

आसमां सियासत से रूबरू हुआ जबसे

चाँद भी नहीं मिलता चांदनी नहीं मिलती---बहुत सुन्दर 

 

जाम के हवाले से दो जहां उठा लाया

मैकशी के आलम में बूँद भी नहीं मिलती--क्या बात 

बात में सचाई हो, रूह में खुदाई हो

आदमी नहीं जिसमें कुछ कमी नहीं मिलती---बेहतरीन 

बहुत बहुत बधाई  दिली दाद कबूलें 

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 6:55pm
आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। नमन।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 6:53pm
आदरणीय दिनेश भाई जी आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा से आनंदित हूँ। हार्दिक धन्यवाद भाई जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 23, 2015 at 6:25pm
आसमां सियासत से रूबरू हुआ जबसे
चाँद भी नहीं मिलता चांदनी नहीं मिलती
बहुत खूब, ढेरों बधाइयां , प्रिय मिथिलेश जी , सादर।
Comment by दिनेश कुमार on March 23, 2015 at 6:21pm
एक से बढ़कर एक, कमाल के अशआर, जैसे मोती पिरोए हों, वाह वाह वाह।भाई मिथिलेश जी, बहुत दाद कबूल कीजिए। लेखनी व सोच दोनों को सलाम भाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 5:51pm
आदरणीय नरेंद्र सिंह जी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 3:49pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर, आपकी सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया से सदैव उत्साहवर्धन होता है और मनोबल बढ़ता है। स्नेह और आशीर्वाद के लिए नमन।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 3:43pm
आदरणीया निधि जी ग़ज़ल पर आपकी विस्तृत और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पाकर जी खुश हो गया। आपका हृदय से आभारी हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 3:41pm
आदरणीय श्याम नरेन् वर्मा जी सराहना और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार। बहुत बहुत धन्यवाद।

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