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मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर..........

बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर
मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर

हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,
ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर

सुबह से हो गयी शाम और अब रात भी
पैर हैं कि थकने का , नाम नहीं लेते , मगर

वो खरीददार है , कोई क़ीमत भी दे सकता है
अभी आया है कहाँ , वो मेरी चौखट पे , मगर

करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय"
सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर

अजय कुमार शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 610

Comment

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Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 9:00am

आदरणीय अजय जी ,सुन्दर भावपूर्ण ग़ज़ल हुई है |मतले को देखने पर काफ़िया किस्मत\ज़रुरत (अत) है ,,और रदीफ़ ..पे मगर है .....इसी का निर्वहन सभी अशआर में होता तो मज़ा आ जाता (बहर \वज़न की पर गौर अभी नहीं कर रहा हूं )...आ.अजय जी ...अन्यथा न लें .....स्नेह बनाए रखें |सादर .

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 11, 2015 at 11:08pm
बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर
मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर
वाह ,आदरणीय अजय शर्मा जी , बहुत ही प्रभावशाली ग़ज़ल , बधाई , सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:50pm

बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर
मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर  वाह! वाह!

हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,
ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर       लाजव़ाब!

हादिक बधाइयाँ आ० अजय जी

Comment by ajay sharma on March 11, 2015 at 9:57pm

bahut khushnasibi hai meri ki apko rachna pasand aayi

Comment by maharshi tripathi on March 11, 2015 at 5:43pm

करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय" 
सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर,,,,,,,,,,बहुत सुन्दर आपको हार्दिक बधाई आ.अजय शर्मा जी |

Comment by विनय कुमार on March 11, 2015 at 1:38pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय..

Comment by Shyam Mathpal on March 11, 2015 at 1:30pm

Aadarnya Ajay Ji

Sundar rachana ke liye badhai.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 12:34pm

अजय शर्मा जी

बहुत बढ़िया गजल हुयी i सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on March 11, 2015 at 10:13am

आदरणीय अजय जी , सुन्दर प्रयास पर बधाई प्रेषित ! सादर 

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