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आम आदमी हूँ , रोज़ गिरता संभलता हूँ , क्या करूँ ..............

मैं रोज़ ढलता हूँ पर , निकलता हूँ , क्या करूँ
सूरज हूँ ,  मगर रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //

मैं मिट्टी नहीं , न हि पानी न कोई खुश्बू
मैं हवा का इक झोंखा हूँ , आँख मल्ता हूँ , क्या करूँ //

मैं बचपन भी कहाँ अब , जवानी भी नहीं हूँ मैं
बुढ़ापा हूँ मैं , इसीलिए खलता हूँ , क्या करूँ//

न कोई सफ़र हूँ मैं , न कोई पड़ाव न सराय कोई
मील का पत्थर हूँ मैं , बस टलता हूँ , क्या करूँ //

कहाँ खुद्दार हूँ मैं , अना वाला भी नहीं हूँ मैं
आम आदमी हूँ , रोज़ गिरता संभलता हूँ , क्या करूँ //

 

अजय कुमार शर्मा
मौलिक & अप्रकाशित

Views: 590

Comment

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Comment by रमेश कुमार चौहान on February 25, 2015 at 10:01pm

आदरणीय शर्माजी, इस सुंदर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 25, 2015 at 1:34pm

क्या बात है ..उम्दा गजल..आदरणीय डॉ गोपाल नारायन जी से मई सहमत हूँ..'मगर' का प्रयोग ठीक नही लग रहा!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 12:43pm

सूरज हूँ ,  मगर रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //  ----अजय भाई इसमें 'मगर' का प्रयोग ठीक नहीं लग रहा --सूरज हूँ और  रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //  विचार करे  i सादर i गजल बेइन्तेहा सुन्दर बन पडी है i सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 10:54am

मैं रोज़ ढलता हूँ पर , निकलता हूँ , क्या करूँ 
सूरज हूँ ,  मगर रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //  वाह ..आदरणीय अजय शर्मा जी , सुन्दर प्रस्तुति है ,बधाई आपको !

Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 10:01am

मैं बचपन भी कहाँ अब , जवानी भी नहीं हूँ मैं 
बुढ़ापा हूँ मैं , इसीलिए खलता हूँ , क्या करूँ//

न कोई सफ़र हूँ मैं , न कोई पड़ाव न सराय कोई
मील का पत्थर हूँ मैं , बस टलता हूँ , क्या करूँ //

आदरणीय अजय जी ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |आम आदमी की पीड़ा मुखर हुई है |हार्दिक बधाई स्वीकार करें |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 1:26am

आदरणीय अजय शर्मा जी , सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई, सादर।

Comment by maharshi tripathi on February 24, 2015 at 11:12pm

वाह! अतिसुन्दर गजल पर बधाई स्वीकार हो आ.अजय जी |

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 24, 2015 at 11:25am
कहाँ खुद्दार हूँ मैं , अना वाला भी नहीं हूँ मैं
आम आदमी हूँ , रोज़ गिरता संभलता हूँ , क्या करूँ //
बहुत खूब , आदरणीय अजय शर्मा जी , सुन्दर, बधाई, सादर।

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