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मिटा दूँ या मिट जाऊँ -- अतुकांत ( गिरिराज भण्डारी )

मिटा दूँ या मिट जाऊँ

-----------------------

कब से भटक रहा हूँ

कभी पानी हुये

तो कभी खुद को नमक किये 

कोई तो मिले घुलनशील

या घोलक

घोल लूँ या घुल जाऊँ ,

समेट लूँ

अपने अस्तित्व में या

एक सार हो जाऊँ , किसी के अस्तित्व संग

विलीन कर दूँ ,

खुद को उसमें

या कर लूँ ,

उसको खुद में

भूल कर अपने होने का अहम

और भुला पाऊँ किसी को

उसके होने को   

ख़त्म हो जाये दोनों का ठोस पन

ज़ाहिर हो वास्तविक तरलता

बचे बस प्रेम

बहे बस प्रेम

इस क्षितिज से उस क्षितिज तक

भर जाये ,

लबालब ॥

******************************* 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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Comment

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Comment by maharshi tripathi on March 10, 2015 at 6:57pm

बचे बस प्रेम

बहे बस प्रेम

इस क्षितिज से उस क्षितिज तक,,,,,,,,,,वाह !!!अत्यंत सुन्दर पंक्ति आपको दिली बधाई आ.गिरिराज सर जी |

Comment by Hari Prakash Dubey on March 10, 2015 at 6:52pm

आदरणीय गिरिराज सर ,सुन्दर भाव पूर्ण  रचना ,

घोल लूँ या घुल जाऊँ ,

समेट लूँ

अपने अस्तित्व में या

एक सार हो जाऊँ ..बहुत सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई आपको सर !

Comment by विनय कुमार on March 10, 2015 at 6:31pm

बचे बस प्रेम
बहे बस प्रेम
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक
भर जाये ,
लबालब ॥ वाह , वाह | बहुत सुन्दर , बहुत बहुत बधाई इस रचना की लिए..

कृपया ध्यान दे...

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