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संतुष्टि कहाँ है...? (अतुकांत)

धीमी-धीमी सी

हवाओं में

दीपों की टिमटिमाती लौ

दे जाती है

अंतर को भी रोशनी

बे-समय आँधियों ने

कब किया है, रोशन

बस! बुझा दिया

या फूंक दिए है जीवन

उन्ही दीपों से.

अथाह तेज बारिशों ने भी

बहा दिए हैं, जीवन

नदियों के मटमैले

जल से

प्यासा, प्यासा ही रहा

वैसे ही, जैसे

वैशाख-ज्येष्ठ की धूप में

बैठा हो

शुष्क किनारों पर

जीवन को तो

उतनी ही हवा

मिलती रहे

जब तक अंदर

ली हुई..सांसें

बाहर न निकल आयें

प्यासे को भी तो

मिली है, तृप्ति

कल-कल करती

नदियों से

न अल्प

और न ही अधिक

फिर क्यों..?

असंतुष्ट है

समानता ही जीवन है, तो

संतुष्टि कहाँ  है...?

 

         

         जितेन्द्र पस्टारिया

      (मौलिक व् अप्रकाशित)

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 7, 2015 at 9:49pm

 आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया जी  बहुत गूढ़ भावो से सजी हुई बेहतरीन रचना. हार्दिक बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 8:41pm

आदरणीया राजेश दीदी. अभिव्यक्ति पर आपकी सराहना व् स्नेहिल उत्साहवर्धन हमेशा मन को ख़ुशी और लेखनकर्म को मनोबल देता रहा  है. स्नेह व् आशीर्वाद यूँही बनाए रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 8:37pm

आपकी बधाई शिरोधार्य है, आदरणीय बागी जी. रचना पर आपकी स्नेहिल उपस्थिति और सराहना के लिए हृदयतल से आभारी हूँ, स्नेह बनाए रखियेगा

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 7, 2015 at 8:07pm

जीवन को तो

उतनी ही हवा

मिलती रहे

जब तक अंदर

ली हुई..सांसें

बाहर न निकल आयें---वाह्ह बहुत सुन्दर गहन पंक्तियाँ ,सबको पता है चादर उतनी लेनी चाहिए जितनी में पैर ढक जाएँ ,किन्तु अमल कौन करता है ..क्यूंकि मन में संतुष्टि ही नहीं है ....बहुत सुन्दर रचना ..हार्दिक बधाई जितेन्द्र भैय्या 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 7, 2015 at 3:01pm

सचमुच अचंभित हूँ, आपकी कलम से निकली इस स्तर की कोई पहली अतुकांत रचना मैं पढ़ रहा हूँ, इस भावाभिव्यक्ति हेतु ढेरों बधाई आदरणीय जितेन्द्र जी.  

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 1:44pm

आपका आशीर्वाद व् बधाई, सहर्ष स्वीकार है आदरणीय डा.विजय जी.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 1:42pm

रचना पर आपकी उपस्थिति व् सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार, आदरणीय खुर्शीद साहब.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 1:40pm

उत्साहवर्धन हेतु आपका आभार, आदरणीय श्याम नारायण जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 1:39pm

आदरणीय गिरिराज जी.रचना की सराहना व् स्नेहिल मार्गदर्शन //संतुष्टता को संतुष्टि करना अच्छा लगेगा// हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ.

सादर!

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 7, 2015 at 12:12pm
जितनी आवश्यकता हो उतना ही चाहिए , यही संतुष्टि बोध है। बहुत सुन्दर विचार , बहुत सुन्दर रचना , बहुत बहुत बधाई प्रिय जीतेन्द्र जी, सादर।

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