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प्यार की भी कोई जात होती है ?

लग गयी हमारे-तुम्हारे प्यार को,

कुछ हवा शायद जो नज़र होती है !

 

और नज़र उतारती थी जो अम्मा,

अब कौन जानता किधर सोती है !

 

मुस्कराते थे पनघट, जो हम पर ,

उनकी हँसी अब उन्हीं पर रोती है !

 

लगे हमारे तुम्हारे मिलन पर पहरे,

दीवार  हर बात- बात पर रोती है !

 

मिल नहीं पाता  मैं अब तुमसे ,

तुमसे ख्वाबों में मुलाकात होती है !

 

दिन नहीं होता  धरती पर अब ,

अब धरती पर  सिर्फ रात होती है!

 

मरू सी लगती  मन की धरा ,

धरा पर अश्रुओं की बरसात होती है!

 

किस बात पर  नाराज हैं सब,

प्यार की भी कोई जात होती है ?

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

 

Views: 855

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 1:24pm

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय अमन जी !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 1:22pm

उत्साहवर्धन और सराहना हेतु दिल से आभार आपका आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी साहब सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 1:21pm

रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारी  जी ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 1:19pm

आदरणीय gumnaam pithoragarhi  जी , उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार सादर!

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 1:14pm

 शिशिर जी रचना पर सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार !

Comment by aman kumar on January 14, 2015 at 12:03pm

अति सुंदर !

Comment by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 11:38am

मरू सी लगती  मन की धरा ,

धरा पर अश्रुओं की बरसात होती है!

 आदरणीय हरिप्रकाश सर ,सुन्दर भावों से सजी प्रेमपगी रचना हेतु आपको बधाई |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 14, 2015 at 11:11am

मिल नहीं पाता  मैं अब तुमसे ,

तुमसे ख्वाबों में मुलाकात होती है !-----बहुत खूब 

सुन्दर प्रस्तुति हुई है बहुत बहुत बधाई हरिप्रकाश जी 

 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 13, 2015 at 10:28pm

रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत - बहुत धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा त्रिपाठी जी ! सादर

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 13, 2015 at 6:26pm

और नज़र उतारती थी जो अम्मा,

अब कौन जानता किधर सोती है !

 वाह सर जी खूब कहा वाह

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