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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२  २२  २२  २२  २२  २२

कैलेण्डर के सवालों से सहम जाता हूँ मैं

ईद दीवाली को जब नज़र मिलाता हूँ मैं

परदों से घर का हाल भला  लगता है

परदों से घर की मुफलिसी छुपाता  हूँ मैं

जीवन और गणित का हिसाब यार खरा है

जब आंसूं जुड़ता है हँसी घटाता हूँ मैं

मैं था काफिला था और सफ़र लम्बा

मन्जिल तक जाते तनहा रह जाता हूँ मैं

कोई मुझसे भी पूछे तू क्या चाहे गुमनाम

है प्यास  प्यार की ,प्यासा रह जाता हूँ मैं

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 8:22pm

आदरणीय गुमनाम जी आपकी ग़ज़ल प्रभावित करती है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by umesh katara on December 11, 2014 at 8:03pm

वाहहहहहहहहह

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 11, 2014 at 12:30pm
धन्यवाद दोस्तो ..............
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 11, 2014 at 12:30pm
धन्यवाद दोस्तो ..............
Comment by Shyam Narain Verma on December 11, 2014 at 10:07am

 हार्दिक बधाई स्वीकारें इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए................

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 8:30pm
परदों से घर की मुफलिसी छुपता हूँ

जब आंसूं जुड़ते है है हँसी घटाता हूँ

मन्जिल तक जाते तनहा रह जाता हूँ मैं
वाह , क्या बात है , आदरणीय गुमनाम जी, बहुत ही लाजवाब रचना है , बधाई।

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