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वक़्ते-पैदाइश पे यूं

मेरा कोई मज़हब नहीं था
गर था मैं,

फ़क़त इंसान था, इक रौशनी था

बनाया मैं गया मज़हब का दीवाना
कि ज़ुल्मत से भरा इंसानियत से हो के बेगाना
मुझे फिर फिर जनाया क्यूँ
कि मुझको क्यूँ बनाया यूं

पहनकर इक जनेऊ मैं बिरहमन हो गया यारो
हुआ खतना, पढ़ा कलमा, मुसलमिन हो गया यारों
कहा सबने कि मज़हब लिक्ख
दिया किरपान बन गया सिक्ख

कि बस ऐसे धरम की खाल को
मज़हब के कच्चे माल को
यूं ठोककर और पीटकर
खूं से सजाने वाला था
फ़ित्ना सिखाने वाला था
इक कारखाना कारगर
यारो कि मेरा अपना घर.…… अपना घर

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(मौलिक व अप्रकाशित) - मिथिलेश वामनकर
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 4, 2014 at 9:38pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी आपका इस रचना पर उपस्थित होना ही मेरे लिए बड़ा प्रोत्साहन है। धन्यवाद। आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 4, 2014 at 9:21pm

पहनकर इक जनेऊ मैं बिरहमन हो गया यारो 
हुआ खतना, पढ़ा कलमा, मुसलमिन हो गया यारों 
कहा सबने कि मज़हब लिक्ख 
दिया किरपान बन गया सिक्ख-------बहुत खूब लिखा है आपने ये धर्म ये मजहब हम इंसानों की ही देन हैं भगवान ने तो सिर्फ इंसान बनाया है .बहुत शानदार प्रस्तुति 

हार्दिक बधाई मिथिलेश जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 4, 2014 at 8:36pm
आदरणीय विजय शंकर जी धन्यवाद । बेहतरीन और जीवन का सत्य दर्शाती आपकी पंक्तियाँ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 4, 2014 at 10:30am
आदरणीय मिथलेश वामनकर जी , आपकी प्रस्तुत कविता अच्छी लगी , मेरी ओर से ये पंक्तियाँ समर्पित हैं आपकी इस रचना को -
जब पैदा हुआ था
वह धरती का एक इंसान था ,
जब गया यहां से
तो धरती का एक इंसान था.
सारे भेद भाव उसे
यहीं मिले थे , यहीं वो
छोड़ गया उनकों , उनके लिए
जिन्होंनें वे बनाये थे .
मेरी ओर से आपको बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 9:52pm
आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी बहुत बहुत धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 9:51pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण जी रचना पर टिप्पणी एवम् अशिर्वाद के लिए ह्रदय से धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 9:49pm
इस प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2014 at 9:47pm
बहुत बहुत धन्यवाद। आभार आदरणीय श्याम वर्मा जी
Comment by Hari Prakash Dubey on December 3, 2014 at 7:35pm

सुन्दर रचना मिथिलेश वामनकर जी ,बधाई आपको !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2014 at 7:00pm

vaamankar jee

बहुत अर्थ पूर्ण लिखा आपने i सादर बधाई i

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