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घर जलाना भी हमारा व्यर्थ अब - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    212
**
मयकदे को अब शिवाले बिक गये
रहजनों  के  हाथ  ताले बिक गये
**
घर  जलाना भी  हमारा व्यर्थ अब
रात  के  हाथों  उजाले  बिक  गये
**
जो खबर थी अनछपी ही रह गयी
चुटकले  बनकर मशाले बिक गये
**
न्याय फिर बैसाखियों पर आ गया
जांच  के  जब  यार आले बिक गये
**
दुश्मनों की अब जरूरत क्या रही
दोस्ती के फिर से पाले बिक गये
**
सोचते  थे नींव जिनको गाँव की
वो शहर में बनके माले बिक गये

**


मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 624

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 1:30am

सोचते  थे नींव जिनको गाँव की
वो शहर में बनके माले बिक गये.. .

इस ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए बधाई.

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on August 9, 2014 at 11:34am

nice gazal badhai

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 8, 2014 at 1:54pm

दुश्मनों की अब जरूरत क्या रही
दोस्ती के फिर से पाले बिक गये........वाह! कमाल , आदरणीय दिली बधाई आपको

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 8, 2014 at 12:58pm

आदरणीय लक्ष्मण जी ..शानदार ग़ज़ल गुनगुनाये में खूब आनंद आया ..मेरी तरफ से हार्दिक बधाई सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 8, 2014 at 12:40pm

धामी जी

बेहतरीन i

घर  जलाना भी  हमारा व्यर्थ अब
रात  के  हाथों  उजाले  बिक  गये
**

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