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कुछ भी कह लो मित्र तुम , विष जब आये काम

सिर्फ दोष अपने कहो , क्यों होते हैं आम

 

कौन काम को देख के , अब देता है दाम  

थोड़ा मक्खन, साथ में , है जो सुन्दर चाम 

 

सूर्य समय से डूब के , खुद कर देगा शाम

नाहक़ बदली हो रही , हट जा, तू बदनाम

 

सबकी मंज़िल है अलग , अलग सभी के धाम  

फिर क्यों छोड़ा साथ वो , पाता  है  दुश्नाम

 

हवा रुष्ट आंधी हुई , धूल उड़ी हर गाम  

कितने नामी के हुये , धूमिल सारे  नाम  

****************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 10, 2014 at 8:26am

आदरणीय राम भाई , आपका बहुत आभार |

Comment by ram shiromani pathak on August 8, 2014 at 4:37pm

     सुन्दर दोहे हुए है आदरणीय। ।  हार्दिक बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 8, 2014 at 8:23am

आदरणीय आशुतोष भाई , आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 8, 2014 at 8:22am

आदरणीय प्रदीप कुशवाहा भाई , आपका शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 8, 2014 at 8:21am

आदरणीय जितेन्द्र भाई , आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 8, 2014 at 8:21am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी, दोहे बिन्दुवत नही हो पाये इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ , मै सुधरने और रचना को और सुधारने का हमेशा प्रयास करते रहता हूँ , आशा है आगे कुछ अच्छा कह पाउँ । जो कुछ आपको अच्छे लगे उसके लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 8, 2014 at 8:18am

आदरणीय सौरभ भाई , आपकी बताई हुई गलतियाँ सर आखों पर , कुछ तो गलती एक ही तुकांतता पर पाँचो दोहे कहने की कोशिश के कारण हो गई , और कुछ नासमझी से । मै सुधारने की कोशिश जरूर करूँगा , शायद भाव सुधारने के लिये एक ही तुकांतता की ज़िद छोड़नी पड़े । आपकी मूल्यवान प्रतिक्रिया के लिये आपका बहुत आभार । अगर इसी तुकांतता मे सुधरने की गुंजाइश आपको दिखे तो जरूर बतायें ,  मुझे अतीव प्रसन्नता होगी ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 7, 2014 at 6:58pm

सूर्य समय से डूब के , खुद कर देगा शाम

नाहक़ बदली हो रही , हट जा, तू बदनाम..बेहतरीन  दोहे पढ़कर आनद आ गया ..आदरणीय भाईसाब आपको ढेर सारी बधाई सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 7, 2014 at 1:28pm

सीखने  का एक अवसर प्राप्त हुआ आभार .सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 7, 2014 at 12:09pm

बहुत बहुत सुंदर दोहावली पर बधाई आदरणीय गिरिराज जी

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