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जिन्होंने रास्तों पर खुद कभी चलकर नहीं देखा
वही कहते हैं हमने मील का पत्थर नहीं देखा

.
मिलाकर हाँथ अक्सर मुस्कुराते हैं सियासतदाँ
छिपा क्या मुस्कराहट के कभी भीतर नहीं देखा
.

उन्हें गर्मी का अब होने लगवा अहसास शायद कुछ
कई दिन हो गए उनको लिए मफलर नहीं देखा
.

सड़क पर आ गई थी पूरी दिल्ली एक दिन लेकिन
बदायूं को तो अब तक मैंने सड़कों पर नहीं देखा
.

फ़क़त सुनकर तआर्रुफ़ हो गया कितना परेशां वो
अभी तो उसने मेरा कोई भी तेवर नहीं देखा
.

अभी तो बाबुओं ने ही उसे दौड़ा के रक्खा है
अभी तो उसने ढंग का एक भी अफसर नहीं देखा
.

ये जैसलमेर की जलती ज़मीं कुछ पूछती तुझसे
बता ऐ अब्र तूने क्यूं कभी मुड़कर नहीं देखा
.

मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 841

Comment

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Comment by विजय मिश्र on June 7, 2014 at 6:16pm
राणाजी , सपाट शब्दों में साधारण की दुर्गति पर सियासतदानोंकी कारगुजारी का स्पष्ट उल्लेख हुआ है |और रचना निष्पक्षता के धरातल पर उतरी है |आभार इस यथार्थपरक रचना केलिए |
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 7, 2014 at 1:34pm

आदरणीय राणा जी ..एक से बढ़कर एक शेर ..वर्तमान के घटनाक्रम पर चुटीला व्यंग्य करता ..कहीं प्रशासनिक व्यवस्थ पर सवाल उठाता ...बैबिध्य पूर्ण बिषयों को छोटी  शानदार ग़ज़ल ..काबिले तारीफ़ इस ग़ज़ल की दिल से तारीफ़ करता हूँ .सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2014 at 10:58am

सड़क पर आ गई थी पूरी दिल्ली एक दिन लेकिन
बदायूं को तो अब तक मैंने सड़कों पर नहीं देखा -----बहुत कुछ कह दिया इस शेर ने ......शानदार .....जख्म कुरेदता हुआ 
ये जैसलमेर की जलती ज़मीं कुछ पूछती तुझसे 
बता ऐ अब्र तूने क्यूं कभी मुड़कर नहीं देखा -------सच  जहाँ जन्मते थे वो पहाड़ों से भी खफ़ा हो गए ....सामयिक शेर बहुत उम्दा 
बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी आ० राणा जी ढेरों दाद कबूलें ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 6, 2014 at 8:42am

एक से बढ़कर एक खूबसूरत शेर हैं बहुत बहुत बधाई आदरणीय राणा साहब इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 6, 2014 at 12:32am

बहुत बेहतरीन गजल हुई आदरणीय राणा साहब, शुरूआती मतले ने ही कहर ढा दिया, दिली बधाई स्वीकार कीजिये 

Comment by coontee mukerji on June 5, 2014 at 5:22pm

राणा जी आप बहुत दिनों बाद दर्शन देते हैं लेकिन जब भी आते आइना दिखा जाते हैं...आपके शेर की खूबी....

जिन्होंने रास्तों पर खुद कभी चलकर नहीं देखा
वही कहते हैं हमने मील का पत्थर नहीं देखा....इस कटाक्ष में कितना कुछ कह गये.साधुवाद.

Comment by वेदिका on June 5, 2014 at 4:49pm
सड़क पर आ गई थी पूरी दिल्ली एक दिन लेकिन
बदायूं को तो अब तक मैंने सड़कों पर नहीं देखा
इस नाराजगी पर क्या शुभकामना व्यक्त हो!
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 5, 2014 at 12:26pm

फकत सुनकर तआर्रुफ़ ---- बेहतरीन i

शुभ कामना i

Comment by Meena Pathak on June 5, 2014 at 10:29am

लाजवाब .. बेहद उम्दा .. बधाई स्वीकारें 

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