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ये ग़ज़ल नहीं है देश का बयान है

ये  ग़ज़ल नहीं है देश का बयान है, 

डूबते जहाज की ये दास्तान है।

लुट रही है कहकहाें के बीच अाबरु, 

धर्तीपुत्र अाज माैन, बेजुबान है।

गर्व था उन्हें कि बन गये जगतपिता, 

गर्भ में ही मर चुका वाे संविधान है। 

हम ताे नेक हैं ये बाेलता है हर काेई, 

हर काेई कहे कि मुल्क बेइमान है। 

घर ताे बन गया मगर वाे साे नहीं सके, 

बेघराें के बीच घर जाे अालिशान है। 

लाेग पूछते हैं कैसे खण्डहर बना ? 

दिल किसी किले की भाँति सूनसान है।

कृष्णसिंह पेला

(माैलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Krishnasingh Pela on March 30, 2014 at 2:23am

धन्यवाद अादरणीय  laxman dhami जी । हार्दिक अाभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 29, 2014 at 11:31pm

भाई कृष्ण सिंह जी अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई .

Comment by Krishnasingh Pela on March 29, 2014 at 9:18pm

शुक्रिया  Dr Ashutosh Mishra  साहब हाैसला अफजाई के लिए ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 29, 2014 at 4:03pm

वर्त्तमान संदर्भो को उजागर करती एक अच्छी गजल ..तहे दिल बधाई .सादर 

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