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Krishnasingh Pela
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Baitadi
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एक तरही ग़ज़ल: ज़िन्दगी ने पलट के पूछा है/कृष्णसिंह पेला

वक़्त ऐसे मुक़ाम पर लाया

आज हम से बिछड गया साया



चंद हालात ने जो समझाया

उस को अपनी जगह सही पाया



झूठ से जा मिली जुबाँ उसकी

आज पहली दफ़ा वो हकलाया



हमसफ़र की तलाश है सब को

और पा कर भी कोई पछताया



प्यार के नाम पर वहम केवल

उस के सारे वजूद पर छाया



तुम भी लगते बहुत परेशाँ हो

हम को भी ये जहाँ नहीं भाया



किन ख़यालों में फूल था गुमशुम

मैंने हौले छुआ तो इतराया



मुस्कुराहट में आब बाक़ी है

गाँव… Continue

Posted on February 1, 2015 at 11:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल: मर्ज़ अपने हैं सभी...

मर्ज़ अपने हैं सभी कोई न बेगाना

मेरे घर का एक कोना है दवाखाना



इक नशा सा है मगर साकी न पैमाना

ज़ख़्म अपने पास हैं और दूर मैखाना



किस बीमारी का पता क्या है, वतन क्या है

पूछना कुछ हो तो मेरे घर पे आ जाना



आह भी है, ऊह भी है, शाम है ग़मगीन

शम्अ जलती दर्द की, मैं मस्त परवाना



कोई काँटा, कोई पत्थर, कोई ख़ंजर है

दर्ददाताओं से ही अपना है याराना



इक ग़ज़ल आयी ठिठुरती, कह गयी मुझसे

जम न जाना, जनवरी में ठंड है, माना ।…

Continue

Posted on January 20, 2015 at 10:30am — 19 Comments

ग़ज़ल : तुम्हारे लिए जश्न हाेगा ये मेला

सभी रास्ताें पर सिपाही खटे हैं 

ताे फिर लाेग क्याें रास्ते से हटे हैं । 

सियासत अाै मज़हब की दीवारें देखाे 

दीवाराें से ही लाेग गुमसुम सटे हैं । 

सरहद है सराें के लिए अाखरी हद 

अकारण यहाँ पर कई सर कटे हैं…

Continue

Posted on April 13, 2014 at 12:00pm — 27 Comments

ये ग़ज़ल नहीं है देश का बयान है

ये  ग़ज़ल नहीं है देश का बयान है, 

डूबते जहाज की ये दास्तान है।

लुट रही है कहकहाें के बीच अाबरु, 

धर्तीपुत्र अाज माैन, बेजुबान है।

गर्व था उन्हें कि बन गये जगतपिता, 

गर्भ में ही मर चुका वाे संविधान है। 

हम ताे नेक हैं ये बाेलता है हर काेई, 

हर काेई कहे कि मुल्क बेइमान है। 

घर ताे बन गया मगर वाे साे नहीं सके, 

बेघराें के बीच घर जाे अालिशान है। 

लाेग पूछते हैं कैसे खण्डहर बना…

Continue

Posted on March 29, 2014 at 12:30am — 14 Comments

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