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तुम कैसे श्रेष्ठ ? // गणेश जी "बागी"

हे पूज्य !

आप ग़लत थे,
मैं सही था |

आप के कहे को
मान दिया था,
अनुचित आदेश को
मान लिया था |
आप पर विश्वास था,
मिला था आशीर्वाद-
एक अफलित आशीर्वाद |

हे पूज्य!
आप ग़लत थे,
मैं सही था |

आपने तोड़ा था विश्वास,
किंचित, मुझे नही मानना था
संकुचित आदेश,
मुझे नही देना था-
अंगूठा,
दिखला देना था-
अंगूठा,


क्या होता ?
नालायक कहलाता !
अल्प काल के लिए,
किंतु नही घुलता
तिल-तिल, प्रति-दिन,

हे पूज्य!
आज भी लगता है,
आप ग़लत थे,
किंतु,
मैं भी ग़लत था,

आपको सुनता रहा ।
पिछला पोस्ट => अंतर्द्वंद्व

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 11:35pm

सराहना हेतु कॉटिश: आभार आदरणीया कविता वर्मा जी | 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 11:33pm

परम आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी, उत्साहवर्धन तथा आशीर्वाद हेतु कॉटिश: आभार स्वीकार करें, सादर |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 11:31pm

प्रिय रामशिरोमणि जी, सराहना हेतु हार्दिक आभार |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 11:30pm

आदरणीय योगी सारस्वत जी, उत्साहवर्धन हेतु आभार, कृपया आगमन बनाए रखें |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2013 at 11:28pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय अरुण निगम जी, स्नेह बनाए रखें, सादर |

Comment by Kavita Verma on April 17, 2013 at 2:15pm

galat ka samrthan karna galat hota hai ...isse upaje kashmakash ko bakhoobi darshaya aapne ..sundar vicharneey rachna ...

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 17, 2013 at 2:02pm

हे पूज्य!
आज भी लगता है,
आप ग़लत थे,
किंतु,
मैं भी ग़लत था,

आपको सुनता रहा ।
आदरणीय बाग़ी जी 
सादर अभिवादन 
सुन्दर ढंग से दिया ज्ञान 
मानव स्वयं को पहचान 
कहते सुनते तो लोग बहुत कुछ 
क्या गलत क्या सही 
अपने विवेक से जान. 
रचना पे हम कुर्बान. 
सादर बधाई 
Comment by ram shiromani pathak on April 17, 2013 at 12:14pm

 आदरणीय गणेश सर बहुत सुन्दर रचना. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Yogi Saraswat on April 17, 2013 at 12:12pm

क्या होता ?
नालायक कहलाता !
अल्प काल के लिए,
किंतु नही घुलता
तिल-तिल, प्रति-दिन,

हे पूज्य!
आज भी लगता है,
आप ग़लत थे,
किंतु,
मैं भी ग़लत था,

आपको सुनता रहा ।
बहुत सुन्दर और सरल शब्दों में मन की पीड़ा , मन की बात कही है आपने आदरणीय श्री बागी जी ! बहुत बहुत बधाई !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on April 17, 2013 at 10:29am

गलत सही का मायने, घट-बढ़ छइयाँ-धूप

सत्य अटल है सर्वदा , कभी न बदले रूप ||

बहुत ही सरलता से मन के उद्गार व्यक्त किये गये.बधाई आदरणीय.....

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