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अंतर्द्वंद्व // गणेश जी "बागी"

ठगती है,
बार बार,

अंतरात्मा,
आश्वासनों से,
ठीक हो जाएगा,
सब ठीक हो जाएगा,
एक अंतर्द्वंद्व,
सत्य असत्य,
दिल दिमाग़ के मध्य,
नही डिगेगा,
कभी नही डिगेगा,
चलते जाना है,
सत्य के मार्ग पर,
जो घटित होना है,
हो जाय,
कौन अमर यहाँ,
कोई नही,
कोई भी तो नही,
फिर डर कैसा,
उस अहंकार से,
जो क्षण भंगुर है,
चल हट !
चलने दे,
कार्य पथ पर बढ़ने दे,
वो सामने देख
डर के आगे,
जीत है |

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => लघुकथा : ईलाज / गणेश जी बागी

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2013 at 12:01pm

वाह वा !! बहुत शान्दार रचना भाई , हार्दिक बधाई !!!!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 16, 2013 at 4:57pm

आदरणीया गीतिका जी, आप जैसी लेखिका से सराहना पाना संतोष का कारक है, बहुत बहुत आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2013 at 1:20pm

सराहना  बहुत बहुत आभार आदरणीय मनोज शुक्ल जी ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2013 at 1:19pm

आदरणीय निगम साहब, रचना आपको अच्छी लगी यह जान ह्रदय आनंदित है, बहुत बहुत आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 15, 2013 at 1:18pm

आदरणीय डॉ प्राची जी, आपकी विवेचनात्मक टिप्पणी निश्चित ही उत्साहवर्धन कर रही है, बहुत बहुत आभार । 

Comment by वेदिका on April 15, 2013 at 12:45pm
अतुकांत काव्य शैली में बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय गणेश जी

सचमुच ही तो डर के आगे जीत है |
Comment by manoj shukla on April 15, 2013 at 9:05am
बहुत अच्छा काव्य.... बधाई स्वीकार करें..... सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on April 14, 2013 at 11:49pm

आदरणीय बागी जी, सदा अंतर्द्वंद्व में उलझे मानव-मन को प्रेरित करती सुंदर व सारगर्भित रचना हेतु बधाई....

Comment by Vindu Babu on April 14, 2013 at 9:22pm
जी आदरणीय,ओ.बी.ओ. के मंच से मिल रही स्नेहात्मक प्रतिक्रिया/प्रेरणा से मन अभिभूत है। 'सीखने और सिखाने' की क्रिया ही तो इस परिपाटी का मुख्यार्षण है।
सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 14, 2013 at 5:20pm

अंतरात्मा के आश्वासन...

सत्य- असत्य पर आधारित दिल-दिमाग के अंतर्द्वंद्व...

जहाँ कुछ न सूझे..कभी डर हावी तो कभी आत्मविश्वास 

फिर एक आत्मघोश..........

कौन अमर यहाँ,
कोई नही,
कोई भी तो नही,
फिर डर कैसा,
उस अहंकार से,
जो क्षण भंगुर है,

क्षणभंगुर अहंकारों से क्या डरना

सत्य यही है, कि जो सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ जाता है, डर भी उसके सामने हार जाता है..

अतुकांत शैली में सुन्दर दर्शन को साझा करती बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय गणेश जी 

हार्दिक बधाई 

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